प्राचीन शिक्षा की बात करें तो उसका एकमात्र
उद्देश्य माना जाता था ज्ञान अर्जन एवं अनुशासन, प्राचीन शिक्षा विशेषकर मानसिक
और आध्यात्मिक विकास बल देती थी जिसके लिए भारत में गुरुकुल प्रणाली का विकास किया
गया था, उस समय कागज का आविष्कार नहीं हुआ था इसलिए पुस्तकों
द्वारा शिक्षा देने का प्रश्न ही नहीं उठता उस समय सब प्रकार के शिक्षा मौखिक या
व्यवहारिक रूप से दी जाती थी इसलिए उस समय के विद्वान जो कुछ पढ़ते थे उससे जन्म
भर के लिए स्मरण शक्ति द्वारा सुरक्षित बना लेते थे। परंतु आधुनिक शिक्षा व्यक्ति
के लिए ना केवल मानसिक और आध्यात्मिक विकास पर बल देती है बल्कि शारीरिक एवं
सामाजिक विकास तथा आवश्यकता या बाजार के अनुसार भी शिक्षा पर बल देती है कुल
मिलाकर कहा जा सकता कि आधुनिक शिक्षा डिजिटल शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का
सर्वांगीण विकास तथा उसमें सामाजिक कुशलता के गुणों का विकास करना है। डिजिटल
शिक्षा एवं भारत की प्राचीन शिक्षा को देखने से यह प्रतीत होता है कि दोनों शिक्षा
प्रणाली कागज मुक्त शिक्षा है जो की पूर्णता सहज और सरल तथा मातृभाषा के निर्माता
पाठ्यक्रम को संग्रहित कर बच्चों के अधिगम को सुगम बनाता हैI
मानव संसाधन विकास
मंत्रालय भारत सरकार द्वारा अगस्त माह में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 जारी कर दी गई। जिसे मुख्य
रूप से चार भागों में विभाजित किया गया है जिसके अंतर्गत 27 अध्याय
हैं। प्रथम भाग स्कूल शिक्षा, दूसरा भाग उच्चतर शिक्षा,
तीसरा भाग केंद्रीय विचारणीय मुद्दे जो व्यवसायिक शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, प्रौद्योगिकी एवं भारतीय भाषाओं,
कला और संस्कृति से संबंधित नीतियों के संबंध में है। भाग चार इस
संपूर्ण राष्ट्रीय शिक्षा नीति का क्रियान्वयन कैसे किया जाए इसकी रणनीति पर
आधारित है। आजाद भारत में सर्वप्रथम डॉक्टर सर्वपल्ली
राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग की गठन की गई जिसका मुख्य
उद्देश्य था भारत के विश्वविद्यालय शिक्षक की कमी को जानना एवं उस कमी को दूर करने
के लिए सुझाव देना। भारत का सबसे पहला राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 में जारी किया गया जिससे
कोठारी आयोग के सुझाव को सम्मिलित किया गया उसके बाद दूसरी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986
को जारी किया गया जिसमें पहली बार कंप्यूटर आधारित शिक्षा की बात
कही गई इसके क्रियान्वयन के लिए प्रोग्राम ऑफ एक्शन चलाया गया 6 साल के बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 को संशोधित
किया गया था और उस नीति के कुछ कार्य को पूरा करने का प्रयास वर्तमान शिक्षा नीति 2020
द्वारा किया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मुख्य प्रावधान
प्रौद्योगिकी का उपयोग एवं एकीकरण है। आज हम देख रहे हैं कि डिजिटल इंडिया का
अभियान पूरे देश में कार्य कर रहा है। कोविड-19 के समय में
जहां संपूर्ण समाज वर्चुअल एवं डिजिटल पद्धति में कूद पड़ा है, ऐसी स्थिति में आज की जरूरतों को देखते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस,
मशीन लर्निंग, ब्लॉकचेन, स्मार्ट बोर्ड कंप्यूटर एवं अन्य प्रकार के सॉफ्टवेयर द्वारा न सिर्फ
छात्रों में सीखने की प्रतिभा का विकास वरन् समाज
परिवर्तन भी होगा। नई शिक्षा नीति में ऑनलाइन और डिजिटल शिक्षा का उपयोग सुनिश्चित
करने हेतु आवश्यक पहल की गई है। वर्तमान में व्याप्त वैश्विक महामारी की स्थिति को
देखते हुए वैकल्पिक साधनों के इस्तेमाल से शिक्षा की गुणवत्ता को बनाए रखना ऑनलाइन
शिक्षा का अधिक से अधिक लाभ उठा सतना इत्यादि विषयों पर भी अध्ययन करने की
आवश्यकता पर जोर दिया गया है। शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों है ऑनलाइन शिक्षा का
भरपूर लाभ उठा सकें जिस हेतु उपयुक्त प्रशिक्षण के विकास हेतु है आवश्यक कदम उठाने
की आवश्यकता है। इस संदर्भ में शिक्षा नीति की सिफारिशें जिसमें ऑनलाइन शिक्षा के
लिए पायलट अध्ययन डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर ऑनलाइन शिक्षण मंच और उपकरण ऑनलाइन
शिक्षा सामग्री का निर्माण एवं अन्य विभिन्नता एवं विविधता को असमानता को कम करने
हेतु जनसंचार माध्यमों का अधिक से अधिक उपयोग वर्चुअल लेब डिजिटल रिपोजिटरी ऑनलाइन
परीक्षा एवं मूल्यांकन, इत्यादि बहुत महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में तकनीक के समावेशी उपयोग यानि सबको साथ
लेकर चलने की बात कही गई है ताकि कोई भी इससे वंचित ना रहे। साथ ही इसमें शिक्षकों
के प्रशिक्षण की बात भी कही गई है क्योंकि ये जरूरी नहीं कि जो शिक्षक पारंपरिक
क्लासरूम शिक्षण में अच्छा है वो ऑनलाइन क्लास में भी उतना ही बेहतर कर सके। स्कूल
से लेकर उच्चतर शिक्षा तक सभी स्तरों पर शिक्षण के लिए प्रौद्योगिकी के महत्व को
देखते हुए शिक्षा नीति में कई सिफारिशें की गई हैं। स्वयम, दीक्षा जैसे ई-लर्निंग
प्लेटफॉर्म का विस्तार किया जाएगा ताकि शिक्षक विभिन्न यूजर फ्रेंडली उपकरणों की
मदद से छात्रों की प्रगति की निगरानी कर सकें। वर्तमान में कोविड महामारी ने साफ
कर दिया है कि ऑनलाइन कक्षाओं के लिए के लिए टू-वे वीडियो और टू-वे ऑडियो वाले
इंटरफेस की सख्त जरूरत है। छात्रों के मनोरंजन आधारित लर्निंग के लिए ऐप विकसित
किए जाएंगे। अब भी जनसंख्या के एक बड़े हिस्से तक डिजिटल पहुंच नहीं है, ऐसे में मौजूदा जनसंचार माध्यम जैसे टेलीविजन, रेडियो
और सामुदायिक रेडियो का उपयोग शिक्षण सामग्री के प्रसारण के लिए बड़े पैमाने पर
किया जाएगा। परंपरागत शिक्षा पद्धति कोई आलोचना का विषय नहीं
है। यह पद्धति धीरे-धीरे तकनीकों का सहारा लेकर अपने अस्तित्व को पुनः कायम कर
लिया है। परिवर्तन यदि समाज के लाभ के लिए हो रहा है तो उसे न स्वीकारना, समाज के विकास में बाधक बनना
है।
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Tuesday, 8 November 2022
प्राचीन शिक्षा
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