पुस्तक समीक्षा: ‘सन्देह के दायरे’ (कहानी
संग्रह)
रंजय कुमार पटेल (शोधार्थी)
(शिक्षा विद्यापीठ)
महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी
विश्वविद्यालय
वर्धा, महाराष्ट्र |
Email: ranjaykumarbhu@gmail.com
‘सन्देह के दायरे’ डॉ. जयशंकर शुक्ल द्वारा लिखित कुल चार
कहानी संग्रहों बेबसी, सन्देह के दायरे, भरोसे की आँच, तथा आँगन की धूप में से एक
उकृष्ट रोचक एवं पठनीय कहानी संग्रह है | यह डॉ. शुक्ल की द्वितीय रचना है | इस
कहानी संग्रह में समाज के विभिन्न अनछुए पहलुओं पर आधारित बड़ी हीं गहनता एवं
मार्मिकता के साथ कुल दस कहानियों का समावेश किया गया है | यह संग्रह कहानी
तत्त्वों की दृष्टि से भी अत्यन्त ओत-प्रोत एवं उच्च पराकाष्ठा को स्पर्श करने
वाली है | लेखक की सहजता, सरलता, एवं व्यावहारिकता के साथ हीं साथ रोचक भाषा इस
अनुपम संग्रह की प्रत्येक कहानी को दिलचस्प बना देती है |
इस संग्रह में लेखक ने कई विषय क्षेत्रों
को समेटने की सफल कोशिश की है | प्रत्येक
कहानी के उद्देश्य, कथावस्तु, पात्रों का चरित्र-चित्रण, कथोपकथन, देशकाल
अथवा वातावरण तथा भाषा शैली स्पष्ट, सुन्दर एवं सुव्यवस्थित है । संवाद शैली इतनी
प्रभावात्मक है कि इस संग्रह को यदि एक बार पढ़ना शुरू किया जाये तो पूरा पढ़े बिना
खुद को रोका नहीं जा सकता | निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि समाज तथा समाज के
विभिन्न पहलुओं एवं सामाजिक समस्याओं पर लिखी गई कहानियाँ अनायास रूप में हीं दिल
को स्पर्श कर हीं जाती है | इस संग्रह की प्रकृति भी कुछ इसी कोटि की है | बेबस
मानव मन यह सोचने को मजबूर हो जाता है, कि इतने समृद्ध कहे जाने वाले समाज में कुछ
चींजे अभी भी ज्यों कि त्यों है | व्यक्तिगत, सामाजिक, स्थानीय एवं राष्ट्रीय जैसे
विभिन्न स्तरों पर कई मुद्दों को छूती, छेड़ती
और खंगालती ये कहानियां अपने आप में भव्य एवं लाजवाब हैं | यह संग्रह शैक्षिक,
सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक एवं वैश्विक इत्यादि विभिन्न मुद्दों को
स्पर्श करने वाली तथा मानव मस्तिष्क को अमूर्त्त चिन्तन करने हेतु उन्मुक्त करने
वाली है |
संग्रह की शीर्षक
कहानी ‘सन्देह के दायरे’ यथा नाम तथा रूप में धन्य है | इस कहानी के अन्तर्गत
कहानीकार डॉ. शुक्ल ने जो अनुपम छटा बिखेरी है, वह शायद हीं कहीं अन्यत्र देखने को
मिले | इस कहानी में शालू का चरित्र दिव्यता एवं भव्यता को समेटे हुए है | किन्तु
फिर भी उसकी बस एक छोटी सी गलती भाई एवं बेटे तुल्य अमित को भोग विलासिता के प्रति
उन्मुक्त एवं मदहोश बना देती है | हालांकि इस घटना से जहाँ एक ओर शालू की सुन्दरता
का पता चलता है, तो वहीं दूसरी ओर कहानीकार ने शामली के चरित्र के माध्यम से
स्त्रियों को हर क्षण सतर्क रहने का सन्देश भी प्रेषित किया है | शामली कहती है कि
‘देह का आकर्षण अच्छे-अच्छे ऋषि मुनियों की तपस्या भंग कर देता है और तुम तो 11-12
वर्ष के लड़के के सामने हीं नग्न हो बैठी |’ तब इसके प्रत्युत्तर में शालू कहती है
कि ‘तो क्या वो अपनी जवानी का प्रदर्शन मुझपे करेगा, अपनी माँ समान बड़ी बहन पर |’
हालांकि इस रूप में शालू के चरित्र का भी कोई कमजोर पक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता |
संग्रह की पहली
कहानी ‘परिवर्तन’ के माध्यम से कहानीकार ने समाज के पिताओं को यह सन्देश दिया है
कि उन्हें अपने बच्चों के साथ सख्त रवैये को नहीं अपनाना चाहिए | क्योंकि इस कहानी
में एक पिता की वजह से हीं घर में प्रायः अशान्ति बनी रहती है, क्लेश का माहौल
चारो तरफ व्याप्त रहता है | परिणाम स्वरुप बेटे और बहू ने सूरत जाने का निश्चय कर
लिया और वे वहीं पर बस गये, लेकिन पिताजी के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं हुआ | कहानीकार
डॉ. शुक्ल के अनूठे संग्रह की अगली कहानी ‘अनुभव’ भी एक अलग हीं रूप में अनुभव
प्रदान करती है | इस कहानी में लालू एवं कालू के रूप में एक अन्धे एवं एक कुबड़े की
दोस्ती का बखूबी चित्रण किया गया है | इतना हीं नहीं दोस्ती के उतार-चढ़ाव की झलक
भी यहाँ देखने को मिल जाती है | कहानीकार ने दोस्ती में कहीं लालच को तो कहीं
पश्चाताप् को जबरजस्त रूपों में वर्णित किया है |
संग्रह की अगली
कहानी ‘नातेदार’ देश काल एवं वातावरण का स्पष्ट ज्ञान कराने वाली है | कहानी के
पात्र दिव्यांश की जेब से पर्स एवं पैसों का
रेलवे स्टेशन से गहरी नींद में गायब होना, विषम परिस्थिति का उत्पन्न होना,
पास में सिर्फ सोलह रूपये का बच पाना, चलती ट्रेन में पैन्ट्री कार मैनेजर का मदद
करना तथा दिव्यांश की बेटी को देखने के रूप में पैन्ट्री कार मैनेजर का हीं आना
इत्यादि अपने आप में एक अलग हीं प्रकार का दृष्टि प्रदान करता है | तभी तो मैनेजर
कहता है कि ‘भई कुदरत का भी जवाब नहीं आज हमने जिनकी मदद की दो घंटे बाद हीं उनके
साथ रिश्ते की डोर भी बध गई | संग्रह की अगली कहानी ‘देशभक्ति’ भी एक अलग हीं रूप
में देशभक्ति का दर्शन कराने वाली है | इस कहानी में इंस्पेक्टर राठौर कहानी के दो
अन्य पात्रों रमेश एवं सुरेश से यह बताता है कि राज नगर क्षेत्र में नकली नोटों का
कारोबार फ़ैल रहा है | मुझे कुछ सुराग चाहिए | परिणाम स्वरुप देशभक्त रमेश तथा
सुरेश ने अपनी चतुराई एवं बहादुरी से नकली नोट छापने वालों को गिरफ्तार करवाया |
संग्रह की अगली
कहानी ‘नादानी’ एक नए मुकाम पर ले जाने वाली है | इसमें डॉ. शुक्ल ने यह बताया है
कि ‘इज्जत के लिए समाज का मध्यवर्गीय तबका कुछ भी करने को तैयार रहता है | वह अपने
सम्मान, प्रतिष्ठा व इज्जत को अपनी औलाद से भी बड़ा मानने लगता है | परिणाम यह होता
है कि मिथ्या आडम्बर हमें हमारे खून के रिश्तों का खून करने तक को मजबूर कर देते
हैं | हम हमारे बच्चों को जितना नहीं समझ पा रहे हैं, उतना हीं हमारे बच्चे भी
हमें हमारी भावनाओं को समझने में असफल सिद्ध हो रहे हैं |’ संग्रह की अगली कहानी
‘अतीत’ भी अपने आप में एक दार्शनिक दृष्टिकोण समेटे हुए हैं | कहानी का पिता मनोहर
लाल अपने पुत्र सुशांत के प्रति कुछ ज्यादा ही हद तक आगे बढ़कर गलती पर गलती करता
चला आता है | परिणाम स्वरुप सुशांत का हृदय इस तरह टूट जाता है, कि वह अपने पिता
से तन, मन एवं धन से हमेशा-हमेशा के लिए सारे रिश्ते नाते तोड़ देता है | यद्यपि
बीस वर्ष के बाद मनोहर लाल को अपने लिए गये निर्णय पर बहुत हीं पछतावा होता है,
लेकिन फिर भी सुशांत वापस मुड़कर पीछे पिता की ओर कभी नहीं लौटता |
संग्रह की अगली
कहानी ‘अधूरी-सीख’ भी अपने आप में एक नई कहानी एवं एक पूरी सीख है | इस कहानी में
कहानीकार ने यह बताया है कि ‘हमारे देश में व्यक्ति पूजा एक संक्रामक बीमारी है |
आँख बंद करके किसी भी बात पर विश्वास कर लेना हमारा स्वभाव बन गया है | यह उसी तरह
है जैसा चाहे अनचाहे सलाह देना लोगो की आदत बन चुकी है | बाबाओं पर भरोसा करना
हमारे समाज की कुरीति बन चुकी है | संग्रह की अगली कहानी ‘बदचलन’ भी हमारे समाज
में उभर रही एक नई कुरीति का दर्शन कराती है | जिसमें एक पति अपने व्यवसाय की
प्रगति हेतु न केवल एक उच्च घराने की लड़की के साथ प्रेम विवाह करता है, अपितु उसे
पर पुरुष के सामने परोसने हेतु हमेशा तैयार बैठा हुआ होता है | इतना हीं नहीं एक
पति के रूप में अविनाश अपने पत्नी की तारीफ कम्पनी के मालिक के सामने बस इस
उद्देश्य से करता है कि ताकि कम्पनी का मालिक उसकी पत्नी के प्रति आकर्षित हो सके
| एक दो बार तो वह सफल भी हो जाता है | यहीं कारण है कि आलोक वर्मा भी अंजली के
प्रति आकर्षित हो जाता है | संग्रह की अगली एवं अन्तिम कहानी ‘योगदान’ भी एक नए
क्षितिज का दर्शन कराने वाली है | इसमें कहानीकार डॉ. शुक्ल ने एक बेबस और लाचार
पिता के जीवन संघर्षो को वर्णित किया है | कहानी के पात्र रामसेवक की बेटी अंजू
सफलता की आखिरी दहलीज पर पहुँचने के बाद भी भ्रष्टाचार एवं अपने पिता के अपमान के
कारण आत्महत्या कर लेती है | निश्चित रूप से वह कोई कमजोर हृदय वाली महिला नहीं थी
| अन्ततोगत्वा बस यही कहा जा सकता है कि ‘खा गया उसे इस देश का सिस्टम |’
निष्कर्ष-
हालांकि यदि
दुनियाँ की नजर से देखा जाये तो यह संग्रह मुझे उसी दिन प्राप्त हो गई थी, जिस दिन
कि यह मेरे हाथ में आई थी | लेकिन सही मायने में यदि विचार किया जाये तो यह संग्रह
मुझे उस दिन प्राप्त हुई जिस दिन कि मैंने इस संग्रह के अन्तिम पृष्ठ का पारायण
किया | वास्तव में डॉ. शुक्ल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के विषय में यह कहा जा
सकता है कि “छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद के बारे में हमें तो बहुत कुछ नहीं पता है,
लेकिन डॉ. शुक्ल के बारे में हमें बहुत कुछ पता है | किन्तु अफ़सोस तो इस बात का
होता है कि इतना सब कुछ पता होने के बाद भी व्यक्ति अनिर्वचनीय हीं रह जाता है |
उसे यह नहीं समझ में आता कि डॉ. शुक्ल के बारे में क्या कुछ कहा जाये और क्या कुछ
शेष रखा जाये | विभिन्न पुरस्कारों एवं सम्मानों की कड़ी के रूप में तो ये खान हीं
हैं |”
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