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Monday, 13 September 2021

Art of living...

 निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु ।

लक्ष्मी: समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम् ।।

अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा ।

न्याय्यात्पथ: प्रविचलन्ति पदं न धीरा: ।। ( भर्तृहरि )


अर्थ :- नीति को जानने वाले लोग चाहें निन्दा करें या प्रशंसा , अपनी इच्छानुसार धन की देवी लक्ष्मी आए या जाए, मृत्यु अभी हो या चिरकाल के बाद, परन्तु धैर्यवान् लोग न्याय के मार्ग से विचलित नहीं होते हैं ।

Sunday, 5 September 2021

सम्बन्धित साहित्य का अवलोकन

 

भारतीय उपनिषदों का ज्ञान मीमांसीय अध्ययन

शोधकर्त्ता

रंजय कुमार पटेल


v व्यास, कृष्णकान्त (1981), के द्वारा ‘उपनिषदों में ब्रह्म विषयक विचारों का आलोचनात्मक अध्ययन’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि ब्रह्म से बाह्य अथवा ब्रह्मतिरिक्त अन्य किसी भी पदार्थ कि सत्ता नहीं है। ब्रह्म के किसी पक्ष के ज्ञात हो जानें पर समग्र ब्रह्म का ज्ञान हो जाता है, क्योंकि चरमोत्कर्ष तत्त्व ब्रह्म हीं है।

v कुमारी, कुसुमलता (1986), के द्वारा ‘श्वेताश्वतर उपनिषद्: एक दार्शनिक विवेचन’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि श्वेताश्वतर उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बन्धित उपनिषद् है। यह उपनिषद् रूद्र शिव से सम्बन्धित है। इस उपनिषद् में कर्म, उपासना और ज्ञान का समन्वय भी निहित है।

v कुमारी, सुनील (1987), के द्वारा ‘मुण्डक उपनिषद्: एक दार्शनिक विवेचन’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि उपनिषद् वैदिक साहित्य का अन्तिम भाग है। इसीलिए इसे वेदान्त भी कहा जाता है। वस्तुतः वेदों का आध्यात्मिक ज्ञान हीं एकत्र करके उपनिषदों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। मुण्डकोपनिषद् कलेवर की दृष्टि से अत्यन्त लघु है किन्तु इसमें तमाम उपनिषद् के मूल सिध्दान्त समाहित है। जैसे- अहं ब्रह्मास्मि, अयमात्मा ब्रह्म, तत्त्वमसि, सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म आदि सिध्दान्तों का समावेश इसमें प्राप्त होता है।

v आदर्श (1988), के द्वारा ‘ऐतरेय उपनिषद् का दार्शनिक विवेचन’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि आत्मज्ञान से हीं सभी प्रकार के क्लेशों से निवृत्ति होती है। जब जीव को आत्मज्ञान हो जाता है तब वह जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त होकर ब्रह्म भाव को प्राप्त कर लेता है। जन्म-मरण एक भयानक मन्त्रणा है, जिससे छुटकारा केवल आत्मज्ञान के द्वारा हीं प्राप्त किया जा सकता है।

v कुमारी, सविता (1990), के द्वारा ‘स्वामी दयानन्द के अनुवर्ती विद्वानों का उपनिषद् व्याख्या कार्य’ विषय पर शोध कार्य किया गया। उपनिषदों का निर्माण काल और रचना काल निश्चित करते हुए निष्कर्ष रूप में यह पाती है, कि प्रधान उपनिषदों कि रचना बुध्द के आविर्भाव से पूर्व हो चुकी थी। उपनिषदों की रचना मध्य देश के पुरु पांचाल से प्रारम्भ होकर विदेह तक के विस्तृत प्रदेश में हुई प्रतीत होती है। आर्य समाजी विद्वानों नें उपनिषदों की व्याख्याओं एवं टीकाओं के साथ-साथ उपनिषदों पर आलोचनात्मक एवं विवेचनात्मक ग्रन्थों की भी रचना की है। जिससे जन साधारण में भी उपनिषद् ज्ञान का व्यापक प्रचार एवं प्रसार हुआ है।  

v बाला, सरोज (1991), के द्वारा ‘बृहदारण्यक उपनिषद् का दार्शनिक विवेचन’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि बृहदारण्यक उपनिषद् में ब्रह्म का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। आत्मा और ब्रह्म में अभेद स्वीकार किया गया है। आत्मा अपने विशुध्द रूप में परमात्मा में हीं स्थित होता है। जब आत्मा, शरीर इन्द्रिय आदि उपाधियों से सीमित हो जाता है तब वह जीव कहलाता है।

v जेलिनेक, गुन्हिल्द (1993), के द्वारा ‘श्री अरविन्दोज इन्टरप्रिटेशन ऑफ द उपनिषद्स’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि उपनिषद् वास्तविकता का कथन करते हैं। ये चेतना के विकास में योगदान देते हैं।

v देवी, प्रतिभा (1993), के द्वारा ‘ह्यूमनिस्टिक एजूकेशन ड्यूरिंग उपनिषदिक पीरियड’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि मनुष्य अपना अधिकतम विकास तर्कों के द्वारा कर सकता है। उपनिषद् शिक्षा व्यक्ति के स्वयं के पहचान की शिक्षा है। जिसमे प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रकृति के आधार पर वास्तविक यथार्थ की खोज करता है। इस प्रकार उपनिषद् साहित्य आत्म ज्ञान की शिक्षा का द्योतक है।

v देवी, उर्मिला (1993), के द्वारा ‘उपनिषद् मीमांसा में श्री अरविन्द का योगदान’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि शररे अरविन्द ने प्राची विद्वानों की भांति किसी पृथक् वाद का प्रवर्त्तन नहीं किया है तथापि अद्वैत वेदान्त की धारा को उन्होंनें एक नवीन तार्किकता पूर्ण दिशा प्रदान की है। इन्होंनें जगत् को भी ब्रह्म के हीं सदृश सत् तत्त्व के रूप में स्थापित किया है।

v शर्मा, राकेश कुमार (1998), के द्वारा ‘कृष्ण यजुर्वेदीय उपनिषद्: एक अध्ययन’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि ब्रह्म मूर्त्त और अमूर्त्त दो स्वरुप वाला है। इनमें जो मूर्त्त है वह असत्य है तथा जो अमूर्त्त है वहीँ सत्य है। वही ब्रह्म है। वही ज्योति है। वही आदित्य है।

v जयश्री, ओ. (1999), के द्वारा ‘अ कम्परेटिव स्टडी ऑफ कठोपनिषद् एकार्डिंग टू शंकर, रामानुज एण्ड माध्व भाष्याज’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि आचार्य शंकर एवं रामानुज दोनों इस बात से सहमत है कि ईश्वर हीं इस संसार का सृजनकर्त्ता और नाशकर्त्ता है। वहीँ प्रत्येक व्यक्ति को अलग-अलग रूपों में उनके कर्मों के अनुसार फल देने वाला है। इसके साथ हीं साथ दोनों ईश्वर के अवतार और पूजा आदि विषयों में भी सहमत है।

v कुमार, पी. राजेश (2000), के द्वारा ‘ईशावास्योपनिषद्: मतत्रयानुसारेण विवर्शनात्मकमध्ययनम्’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि सभी वेदान्तों का लक्ष्य स्थान एक हीं है, उसे हीं परम पद आत्मतत्त्व के रूप में पुकारा जाता है। विभिन्न नामों से व्यवहृत यहीं तत्त्व विभिन्न सम्प्रदाय के लोगों में अपनें तत्त्व अनुसन्धान के द्वारा प्राप्त किया जाता है। यहीं दर्शन की भिन्नता है न कि दृश्य की।

v भट्ट, लक्ष्मी नारायण (2002), के द्वारा ‘उपनिषत्सु जीवन दर्शनम्’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि उपनिषदों में अध्यात्म विद्या के द्वारा श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि प्रयत्न मानव के जीवन एवं आयु के सापेक्ष चिन्तन है। अतः संसरण शील आत्मा का संसार और बन्धन से मुक्ति का प्रयत्न अनिवार्य है। शरीर से भिन्न शरीर आत्मा है जो पुनर्जन्म वृत्तान्त का बीज है।

v मलिक, इन्ताजहुसैन इमामखान (2003), के द्वारा ‘उपनिषद्स एण्ड इस्लामिक मिस्टिसिज्म अ स्टडी’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि सम्पूर्ण वेदान्त साहित्य रहस्यात्मक तत्त्वों से भरा हुआ है। उपनिषद् भय रहित मृत्यु के विषय में शिक्षा प्रदान करता है। सम्पूर्ण विश्व में ऐसा कोई अध्ययन नहीं है जिसमें उपनिषदों का ज्ञान समाहित न हो। उपनिषद् एवं इस्लामिक साहित्य दोनों में हीं काफी समानता है। क्योंकि ये दोनों हीं अन्तिम सत्य अथवा वास्तविक रूप में केवल एक हीं परम तत्त्व की सार्वभौमिकता को स्वीकार करते हैं।

v वाराखेड़कर, के. वैद्यराजाचार्य (2003), के द्वारा ‘रिफ्लेक्शन ऑफ वेदाज एण्ड उपनिषद्स इन श्रीमद् भागवत’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि उपनिषदों का समावेश यत्र-तत्र क्रमशः स्कन्द पुराण एवं भागवत महापुराण में समानार्थक श्लोक आदि वेदमंत्रो के रूप में हुआ है। ईशादि उपनिषद् वाक्यों का समन्वय तो सम्यक् रूप से प्रदर्शित हुआ है। यहीं प्रबन्ध ग्रन्थ उपनिषद् की विशेषता को वहन कर रहे हैं।

v सिंह, आभा (2006), के द्वारा ‘आचार्य शंकर कृत उपनिषद् भाष्यों का समीक्षात्मक अध्ययन’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि उपनिषदों में बहुविधि विषयों की विशेषता विद्यमान होनें से उनका बहुविधि समीक्षात्मक अध्ययन सम्भव और सार्थक हो सकता है।

v पोख्रेल, शान्ति (2006), के द्वारा ‘छान्दोग्योपनिषत्तत्त्वसमीक्षा’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि ऋषियों के स्वप्रज्ञा चक्षु के द्वारा जिस ज्ञान का साक्षात्कार किया गया, उसे हीं वेद नाम से जाना जाता है। किन्तु वर्तमान समय में ये वेद प्रायः लुप्त होते चले जा रहे हैं। जिसका मुख्य कारण वेदाध्ययन का अभाव है। छान्दोग्योपनिषद् में वर्णित शिक्षा व्यवस्था गुरु और शिष्य के भूमिका की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। ज्ञान निश्चित रूप से ब्रह्म ज्ञान हीं है। क्योंकि ब्रह्मज्ञान में सभी प्रकार के ज्ञान का अवसान हो जाता है। अशान्त संसार ब्रह्मज्ञान के द्वारा शान्ति और मुक्ति दोनों प्राप्त कर सकता है।

v रघुवंशी, श्रध्दा सुभाषचन्द्र (2008), के द्वारा ‘बृहदारण्यक उपनिषद्: एक दार्शनिक अध्ययन’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि उपनिषदों में सर्वाधिक प्राचीन तथा अत्यधिक महत्वपूर्ण बृहदारण्यक उपनिषद् है। जिसमें आहार-व्यवहार तथा प्रतिपाद्य विषयों की दृष्टि से बृहद् वर्णन प्राप्त होता है।

v दूबे, महेन्द्र कुमार (2009), के द्वारा ‘उपनिषद् शिक्षा एवं टैगोर शिक्षा दर्शन का वर्तमान भारतीय परिप्रेक्ष्य में एक तुलनात्मक अध्ययन’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि टैगोर में विश्ववादी भावना देखनें को मिलती है। टैगोर पर उपनिषदों का प्रभाव है। अतएव उनमें विश्ववादी भावना स्वाभाविक है। अतः टैगोर नें शिक्षा का अर्थ अत्यन्त व्यापक रूप में लिया है।

v मिश्रा, राधा (2009), के द्वारा ‘जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण: एक आलोचनात्मक अध्ययन’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण, ब्राह्मण ग्रन्थ की अपेक्षा आरण्यक साहित्य के अधिक निकट प्रतीत होता है। क्योंकि इसके प्रतिपाद्य विषयों में अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों के समान यज्ञ सम्बन्धी विवेचना न होकर वेदी निर्माण, गायन, स्तोत्र, तान्त्रिक प्रक्रियाओं आदि का वर्णन प्राप्त होता है।

v कुमारी, सुनीता (2012), के द्वारा ‘प्रमुख उपनिषदों में पुरुषार्थ चतुष्टय’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि पुरुषार्थ चतुष्टय रूपी सुदृढ़ स्तम्भों पर मानव जीवन रूपी विशाल भवन खड़ा है। इसका उद्देश्य मानव जीवन को सुखद, सुन्दर तथा सरल बनाना है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चार पुरुषार्थ माने गये हैं। इन्हीं के आधार पर मनुष्य अपनें समस्त कार्य पूर्ण करता है।

v शर्मिला, आर. (2013), के द्वारा ‘फेमिनिष्ट क्रिटिक ऑफ उपनिषद्स’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि वास्तविक रूप में उपनिषद् नारी जाति के उत्तराधिकार का दावा नहीं करता। यह प्रकरण पितृ सत्तात्मक विचार के समक्ष एक अवसर है।

v बी., जयप्रकाश (2013), के द्वारा ‘कान्सेप्ट ऑफ माईंड इन द प्रिंसिपल उपनिषद्स’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि प्राचीन भारतीय मनोवैज्ञानिकों के द्वारा तीन प्रकार के गुणों (सत्त्व, रज एवं तम) की चर्चा की गई है इन्हीं तीन गुणों के परस्पर अन्तःक्रिया के परिणाम स्वरुप विभिन्न गुणों से युक्त व्यक्तित्व का निर्माण होता है। भारतीय दर्शन मन अथवा आत्मा के अध्ययन में गहन एवं महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

v सेन गुप्ता, संजीवन (2014), के द्वारा ‘उपनिषदिक इन्फ़्लुएन्स ऑन एजुकेशनल थाट्स ऑफ रवीन्द्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानन्द एण्ड श्री अरविन्दों’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि रवीन्द्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानन्द एवं श्री अरविन्द इन तीनों शिक्षाशास्त्रियों नें अमूर्त्त चिन्तन के परिप्रेक्ष्य में अपने प्रारम्भिक अवधारणाओं एवं अपनें अनुभवों का नेतृत्व किया है। उपनिषद् कालीन शिक्षकों का मूल कर्त्तव्य यह था कि वे शिक्षार्थियों का चरमोत्कर्ष विकास कर सके एवं वास्तविक सत्य की खोज में सहायता कर सके। इसके साथ हीं साथ इन्होंनें यह भी स्पष्ट किया है कि प्रत्येक व्यक्ति वास्तविक रूप से ब्रह्मचर्य एवं अभ्यास के द्वारा प्रशिक्षित होता है।

v दवे, कृष्णा पी. (2015), के द्वारा ‘चार्टिंग आउट ह्यूमन डेवलपमेंट बेस्ड ऑन प्रिन्सिपल उपनिषद्स एण्ड इट्स एजूकेशनल इम्प्लीकेशंस’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि उपनिषदों के सिध्दान्त चार वेदों पर आधारित है। उपनिषद् मनुष्य के वास्तविक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये मानव जीवन के विकास में विभिन्न प्रकार के दृष्टिकोणों का विकास करते हैं। उपनिषदों की अद्वितीय विशेषताएँ एवं एकीकृत दृष्टिकोण जीवन की जटिलता को कम करती है एवं सरल जीवन यापन को अर्थपूर्ण बनाती है।

v कोहन्डेल, हुसैन (2016), के द्वारा ‘कान्सेप्ट ऑफ अल्टीमेट रियलिटी इन मुल्ला सद्रा एण्ड उपनिषद्स: अ कम्परेटिव स्टडी’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि उपनिषद् और मुल्ला सद्रा के अनुसार सम्पूर्ण सृष्टि एक वास्तविक यथार्थ पर निर्भर है। जिसे ब्रह्मा के अस्तित्व पर निर्भर बताया जाता है। उपनिषदों में माया को सम्पूर्ण सृष्टि का कारण बताया गया है। जिसे आचार्य शंकर नें भी स्वीकार किया है। किन्तु मुल्ला सद्रा के अनुसार सृष्टि का कारण प्रेम है। अर्थात् प्रेम के द्वारा सृष्टि का निर्माण हुआ है, ऐसा इन्होंनें स्पष्ट किया है।

 

सन्दर्भ:

v कुमारी, सविता (1990), ‘स्वामी दयानन्द के अनुवर्ती विद्वानों का उपनिषद् व्याख्या कार्य’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 06, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/109733.

v सिंह, आभा (2006), ‘आचार्य शंकर कृत उपनिषद् भाष्यों का समीक्षात्मक अध्ययन’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, उत्तर प्रदेश। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 06, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/178456.

v दूबे, महेन्द्र कुमार (2009), ‘उपनिषद् शिक्षा एवं टैगोर शिक्षा दर्शन का वर्तमान भारतीय परिप्रेक्ष्य में एक तुलनात्मक अध्ययन’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, उत्तर प्रदेश। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 06, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/179918.

v कुमारी, सुनीता (2012), ‘प्रमुख उपनिषदों में पुरुषार्थ चतुष्टय’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 06, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/128195.

v मिश्रा, राधा (2009), ‘जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण: एक आलोचनात्मक अध्ययन’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, उत्तर प्रदेश। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 06, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/180181.

v रघुवंशी, श्रध्दा सुभाषचन्द्र (2008), ‘बृहदारण्यक उपनिषद्: एक दार्शनिक अध्ययन’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 06, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/47426.

v कुमारी, सुनील (1987), ‘मुण्डक उपनिषद्: एक दार्शनिक विवेचन’ अप्रकाशित लघु शोध प्रबन्ध, महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 06, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/44444.

v आदर्श (1988), के द्वारा ‘ऐतरेय उपनिषद् का दार्शनिक विवेचन’ अप्रकाशित लघु शोध प्रबन्ध, महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 06, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/444442.

v कुमारी, कुसुमलता (1986), के द्वारा ‘श्वेताश्वतर उपनिषद्: एक दार्शनिक विवेचन’ अप्रकाशित लघु शोध प्रबन्ध, महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 06, 2018. के द्वारा,         

URI: http://hdl.handle.net/10603/44429.

v शर्मा, राकेश कुमार (1998), ‘कृष्ण यजुर्वेदीय उपनिषद्: एक अध्ययन’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 06, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/123109.

v बाला, सरोज (1991), ‘बृहदारण्यक उपनिषद् का दार्शनिक विवेचन’ अप्रकाशित लघु शोध प्रबन्ध, महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 06, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/51260.

v देवी, उर्मिला (1993), ‘उपनिषद् मीमांसा में श्री अरविन्द का योगदान’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 06, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/57853.

v मलिक, इन्ताजहुसैन इमामखान (2003), ‘उपनिषद्स एण्ड इस्लामिक मिस्टिसिज्म अ स्टडी’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 08, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/46248.

v शर्मिला, आर. (2013), ‘फेमिनिष्ट क्रिटिक ऑफ उपनिषद्स’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, कालीकट विश्वविद्यालय, केरल। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 08, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/159896.

v जेलिनेक, गुन्हिल्द (1993), ‘श्री अरविन्दोज इन्टरप्रिटेशन ऑफ द उपनिषद्स’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, सावित्रीबाई फूले विश्वविद्यालय, पूणे । पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 08, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/162231.

v व्यास, कृष्णकान्त (1981), ‘उपनिषदों में ब्रह्म विषयक विचारों का आलोचनात्मक अध्ययन’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 08, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/57534.

v वाराखेड़कर, के. वैद्यराजाचार्य (2003), ‘रिफ्लेक्शन ऑफ वेदाज एण्ड उपनिषद्स इन श्रीमद् भागवत’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, कर्नाटक विश्वविद्यालय, धारवाड़। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 08, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/99917.

v देवी, प्रतिभा (1993), ‘ह्यूमनिस्टिक एजूकेशन ड्यूरिंग उपनिषदिक पीरियड’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ओड़िशा। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 08, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/187724.

v बी., जयप्रकाश (2013), ‘कान्सेप्ट ऑफ माईंड इन द प्रिंसिपल उपनिषद्स’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय, कोट्टयम, केरल। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 08, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/30553.

v कुमार, पी. राजेश (2000), ‘ईशावास्योपनिषद्: मतत्रयानुसारेण विवर्शनात्मकमध्ययनम्’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय,कालडी, केरल। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 08, 2018. के द्वारा,

URI: http://hdl.handle.net/10603/137655.

v जयश्री, ओ. (1999), ‘अ कम्परेटिव स्टडी ऑफ कठोपनिषद् एकार्डिंग टू शंकर, रामानुज एण्ड माध्व भाष्याज’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय,कालडी, केरल। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 08, 2018. के द्वारा, URI: http://hdl.handle.net/10603/137640.

v पोख्रेल, शान्ति (2006),‘छान्दोग्योपनिषत्तत्त्वसमीक्षा’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, असम विश्वविद्यालय, सिलचर।

पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 08, 2018. के द्वारा, URI: http://hdl.handle.net/10603/93526.

v सेन गुप्ता, संजीवन (2014), ‘उपनिषदिक इन्फ़्लुएन्स ऑन एजुकेशनल थाट्स ऑफ रवीन्द्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानन्द एण्ड श्री अरविन्दों’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, कल्याणी विश्वविद्यालय, नाडिया, पश्चिम बंगाल।

पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 08, 2018. के द्वारा, URI: http://hdl.handle.net/10603/63864.

v दवे, कृष्णा पी. (2015), ‘चार्टिंग आउट ह्यूमन डेवलपमेंट बेस्ड ऑन प्रिन्सिपल उपनिषद्स एण्ड इट्स एजूकेशनल इम्प्लीकेशंस’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, सरदार पटेल विश्वविद्यालय, वल्लभ विद्यानगर, गुजरात।

पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 08, 2018. के द्वारा, URI: http://hdl.handle.net/10603/107485.

v भट्ट, लक्ष्मी नारायण (2002), ‘उपनिषत्सु जीवन दर्शनम्’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, मंगलौर विश्वविद्यालय, मंगलौर, कर्नाटक। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 08, 2018. के द्वारा, URI: http://hdl.handle.net/10603/131798.

v कोहन्डेल, हुसैन (2016), ‘कान्सेप्ट ऑफ अल्टीमेट रियलिटी इन मुल्ला सद्रा एण्ड उपनिषद्स: अ कम्परेटिव स्टडी’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 08, 2018. के द्वारा, URI: http://hdl.handle.net/10603/186118.

 

कार्यशाला प्रतिवेदन

कार्यशाला प्रतिवेदन

(23.03.2018)

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र के शिक्षा विद्यापीठ द्वारा पं. मदन मोहन मालवीय राष्ट्रीय शिक्षक एवं शिक्षण मिशन, मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय, भारत सरकार नई दिल्ली के अन्तर्गत ‘एस.पी.एस.एस. के माध्यम से सामाजिक विज्ञानं में अनुप्रयुक्त सांख्यिकीय विधियाँ’ विषय पर सात दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला ( 21.03.2018 से 28.03.2018 तक ) का आयोजन किया जा रहा है।

          आज दिनांक 23.03.2018 को इस कार्यशाला का तृतीय दिवस था। कार्यशाला के प्रथम सत्र ( 10:00 AM से 12:00 PM ) की व्याख्याता प्रो. रेखा शर्मा, उपनिदेशक, मानव संसाधन विकास केन्द्र, नागपुर विश्वविद्यालय, महाराष्ट्र थी। इनके व्याख्यान का विषय “बुनियादी वर्णनात्मक प्रदत्तों का एस.पी.एस.एस. में उपयोग” था। प्रो. रेखा शर्मा नें अपनें व्याख्यान के प्रारम्भिक चरण में सांख्यिकीय विधियों के बारे में संक्षिप्त में अवधारणात्मक जानकारी प्रदान की। इन्होंनें प्राचल व अप्राचल सांख्यिकीय विधियों पर चर्चा के साथ हीं मापन के विभिन्न स्तर जैसे – नामित, क्रमित, अन्तरित एवं आनुपातिक पर भी प्रकाश डाला। प्रो. रेखा महोदया नें एक्सल सॉफ्टवेयर पर विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से प्रतिभागियों को अभ्यास कराया। महोदया नें उदाहरण के रूप में प्रतिभागियों को कई प्रकार के आँकड़े भी दिये तथा उन्होंनें एस.पी.एस.एस. के माध्यम से कैसे विश्लेषण किया जाता है, यह समझानें का प्रयास किया। इसके बाद  12:00 PM पर चाय अन्तराल हुआ।

पुनः चाय अन्तराल के बाद 12:20 PM से कार्यशाला का द्वितीय सत्र प्रारम्भ हुआ। इस सत्र की व्याख्याता भी प्रो. रेखा शर्मा हीं थी। इन्होंनें प्रथम सत्र के व्याख्यान विषय को हीं और आगे बढ़ाया। द्वितीय सत्र में महोदया नें वर्णनात्मक विश्लेषण एस.पी.एस.एस. पर कैसे किया जाता है, इसको बताने का प्रयास किया तथा सभी प्रतिभागियों को प्रदत्त विश्लेषण करना सीखाया। इसके साथ हीं नामित स्तर के आँकड़ो के विश्लेषण पर भी विस्तार पूर्वक चर्चा अभिव्यक्त की।। प्रो. रेखा शर्मा नें द्वितीय सत्र में अवधारणात्मक जानकारी के बजाय प्रदत्तों के विश्लेषण के अभ्यास कार्य पर अधिक बल दिया। इस प्रकार प्रो. रेखा शर्मा के द्वितीय सत्र का व्याख्यान 01:50 PM पर समाप्त हुआ। इसके बाद 01:50 PM से 03:00 PM तक भोजन अन्तराल हुआ। तत्पश्चात् कार्यशाला का तृतीय सत्र प्रारम्भ हुआ।

          कार्यशाला के तृतीय सत्र ( 03:00 PM से 04:30 PM ) के व्याख्याता प्रो. वी.पी. सिंह ( NCERT, नई दिल्ली ) थे। इन्होंनें एस.पी.एस.एस. से आप लोग क्या समझते हैं ? एस.पी.एस.एस. क्या है ? इसका उपयोग कहाँ होता है ? इसकी प्रासंगिकता एवं उपयोगिता क्या है ? इत्यादि प्रश्नों की श्रृंखला से तृतीय सत्र का शुभारम्भ किया। इन्होंनें एस.पी.एस.एस. से जुड़े व्यावहारिक जानकारी के साथ हीं साथ नवीनतम तथ्यों से भी अवगत कराया। प्रो. वी.पी. सिंह नें विभिन्न उदाहरणों एवं कहानियों के माध्यम से एस.पी.एस.एस. की उपयोगिता पर विस्तार पूर्वक चर्चा अभिव्यक्त की। इन्होंनें एस.पी.एस.एस. से Matrix का Invers कैसे निकालते हैं ? तथा एक्सल से Matrix का Invers कैसे निकालते हैं ? जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न प्रतिभागियों से किया तथा इससे जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी प्रदान की। प्रो. सिंह नें मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलांक पर बात करते हुए प्रतिभागियों के पूर्व ज्ञान को जाननें का प्रयास किया। t – Test किसे कहते हैं ? तथा इसका उपयोग कहाँ किया जाता है ? आदि प्रश्नों पर चर्चा करनें के साथ हीं साथ महोदय नें प्रतिदर्श डिजाईन व सर्वे आदि महत्वपूर्ण सम्प्रत्ययों के सन्दर्भ में भी जानकारी प्रदान की। प्रो. वी.पी. सिंह महोदय नें शोध प्रारूप के चरण व इसके विभिन्न पहलुओं पर भी बात की तथा मानक विचलन एवं मध्यमान पर भी विस्तार से चर्चा किया।

            प्रो. वी.पी. सिंह महोदय नें अपनें रोचक व्याख्यान और सरल व सहज अभिव्यक्ति से कार्यशाला को आनन्दपूर्ण बनाया। महोदय नें अपनें व्याख्यान विषय ‘t – Test का अनुप्रयोग’ के अतिरिक्त अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की। तृतीय सत्र का व्याख्यान प्रतिभागियों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण, प्रासंगिक व उपयोगी रहा। इस प्रकार महोदय का व्याख्यान 04:30 PM तक चला। तत्पश्चात्  04:30 PM से 04:40 PM तक चाय अन्तराल हुआ।

          चाय अन्तराल के बाद पुनः चतुर्थ सत्र आरम्भ हुआ। चतुर्थ सत्र ( 04:40 PM से 06:10 PM ) की व्याख्याता डॉ. सुदेशना लाहिड़ी, सह प्रोफेसर कलकत्ता विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल थी। इनके व्याख्यान का विषय ‘t – Test का निष्कर्ष व एस.पी.एस.एस. के माध्यम से इसका उपयोग’ था। डॉ. सुदेशना लाहिड़ी नें प्रतिभागियों के विषयगत पृष्ठभूमि जाननें के बाद अपना व्याख्यान प्रारम्भ किया। इन्होंनें व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से सांख्यिकीय की विश्वसनीयता को समझानें का प्रयास किया। सरल व सहज वाणी के द्वारा महोदया नें प्रतिभागियों को अभिप्रेरित करनें के साथ हीं साथ विभिन्न सम्प्रत्ययों को स्पष्ट किया। इसके साथ हीं साथ महोदया नें t – Test तथा सांख्यिकीय अवधारणाओं के सैद्धान्तिक पक्ष पर भी प्रकाश डाला। इस प्रकार तृतीय दिवस के सभी सत्र पूर्व निर्धारित समयानुसार विधिवत् सम्पन्न हुए।

*प्रतिवेदन प्रस्तुतकर्त्ता*

*रंजय कुमार पटेल (शोधार्थी), शैक्षिक अध्ययन विभाग, शिक्षा संकाय, महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, पूर्वी चम्पारण, (बिहार), 845401. मो. +91-7355738854 ईमेल- sagarranjay@gmail.com