भारतीय उपनिषदों का ज्ञान मीमांसीय अध्ययन
शोधकर्त्ता
रंजय कुमार पटेल
v व्यास, कृष्णकान्त (1981), के द्वारा ‘उपनिषदों में ब्रह्म विषयक विचारों का
आलोचनात्मक अध्ययन’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में
इन्होंनें यह पाया कि ब्रह्म से बाह्य अथवा ब्रह्मतिरिक्त अन्य किसी भी पदार्थ कि
सत्ता नहीं है। ब्रह्म के किसी पक्ष के ज्ञात हो जानें पर समग्र ब्रह्म का ज्ञान
हो जाता है, क्योंकि चरमोत्कर्ष तत्त्व ब्रह्म हीं है।
v कुमारी, कुसुमलता (1986), के द्वारा ‘श्वेताश्वतर उपनिषद्: एक दार्शनिक विवेचन’ विषय
पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि श्वेताश्वतर
उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बन्धित उपनिषद् है। यह उपनिषद् रूद्र शिव से
सम्बन्धित है। इस उपनिषद् में कर्म, उपासना और ज्ञान का समन्वय भी निहित है।
v कुमारी, सुनील (1987), के द्वारा ‘मुण्डक उपनिषद्: एक दार्शनिक विवेचन’ विषय पर
शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि उपनिषद् वैदिक
साहित्य का अन्तिम भाग है। इसीलिए इसे वेदान्त भी कहा जाता है। वस्तुतः वेदों का
आध्यात्मिक ज्ञान हीं एकत्र करके उपनिषदों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
मुण्डकोपनिषद् कलेवर की दृष्टि से अत्यन्त लघु है किन्तु इसमें तमाम उपनिषद् के
मूल सिध्दान्त समाहित है। जैसे- अहं ब्रह्मास्मि, अयमात्मा ब्रह्म, तत्त्वमसि,
सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म आदि सिध्दान्तों का समावेश इसमें प्राप्त होता है।
v आदर्श (1988), के द्वारा ‘ऐतरेय उपनिषद् का दार्शनिक विवेचन’ विषय पर शोध कार्य किया गया।
शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि आत्मज्ञान से हीं सभी प्रकार के
क्लेशों से निवृत्ति होती है। जब जीव को आत्मज्ञान हो जाता है तब वह जन्म-मरण के
बन्धन से मुक्त होकर ब्रह्म भाव को प्राप्त कर लेता है। जन्म-मरण एक भयानक
मन्त्रणा है, जिससे छुटकारा केवल आत्मज्ञान के द्वारा हीं प्राप्त किया जा सकता है।
v कुमारी, सविता (1990), के द्वारा ‘स्वामी दयानन्द के अनुवर्ती विद्वानों का
उपनिषद् व्याख्या कार्य’ विषय पर शोध कार्य किया गया। उपनिषदों का निर्माण काल और
रचना काल निश्चित करते हुए निष्कर्ष रूप में यह पाती है, कि प्रधान उपनिषदों कि
रचना बुध्द के आविर्भाव से पूर्व हो चुकी थी। उपनिषदों की रचना मध्य देश के पुरु पांचाल
से प्रारम्भ होकर विदेह तक के विस्तृत प्रदेश में हुई प्रतीत होती है। आर्य समाजी
विद्वानों नें उपनिषदों की व्याख्याओं एवं टीकाओं के साथ-साथ उपनिषदों पर
आलोचनात्मक एवं विवेचनात्मक ग्रन्थों की भी रचना की है। जिससे जन साधारण में भी
उपनिषद् ज्ञान का व्यापक प्रचार एवं प्रसार हुआ है।
v बाला, सरोज (1991), के द्वारा ‘बृहदारण्यक उपनिषद् का दार्शनिक विवेचन’ विषय
पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि बृहदारण्यक
उपनिषद् में ब्रह्म का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। आत्मा और ब्रह्म में अभेद
स्वीकार किया गया है। आत्मा अपने विशुध्द रूप में परमात्मा में हीं स्थित होता है।
जब आत्मा, शरीर इन्द्रिय आदि उपाधियों से सीमित हो जाता है तब वह जीव कहलाता है।
v जेलिनेक, गुन्हिल्द (1993), के द्वारा ‘श्री अरविन्दोज इन्टरप्रिटेशन ऑफ द उपनिषद्स’
विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि
उपनिषद् वास्तविकता का कथन करते हैं। ये चेतना के विकास में योगदान देते हैं।
v देवी, प्रतिभा (1993), के द्वारा ‘ह्यूमनिस्टिक एजूकेशन ड्यूरिंग उपनिषदिक
पीरियड’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया
कि मनुष्य अपना अधिकतम विकास तर्कों के द्वारा कर सकता है। उपनिषद् शिक्षा व्यक्ति
के स्वयं के पहचान की शिक्षा है। जिसमे प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रकृति के आधार पर
वास्तविक यथार्थ की खोज करता है। इस प्रकार उपनिषद् साहित्य आत्म ज्ञान की शिक्षा
का द्योतक है।
v देवी, उर्मिला (1993), के द्वारा ‘उपनिषद् मीमांसा में श्री अरविन्द का योगदान’
विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि शररे
अरविन्द ने प्राची विद्वानों की भांति किसी पृथक् वाद का प्रवर्त्तन नहीं किया है
तथापि अद्वैत वेदान्त की धारा को उन्होंनें एक नवीन तार्किकता पूर्ण दिशा प्रदान
की है। इन्होंनें जगत् को भी ब्रह्म के हीं सदृश सत् तत्त्व के रूप में स्थापित
किया है।
v शर्मा, राकेश कुमार (1998), के द्वारा ‘कृष्ण यजुर्वेदीय उपनिषद्: एक अध्ययन’ विषय पर
शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि ब्रह्म मूर्त्त
और अमूर्त्त दो स्वरुप वाला है। इनमें जो मूर्त्त है वह असत्य है तथा जो अमूर्त्त
है वहीँ सत्य है। वही ब्रह्म है। वही ज्योति है। वही आदित्य है।
v जयश्री, ओ. (1999), के द्वारा ‘अ कम्परेटिव स्टडी ऑफ कठोपनिषद् एकार्डिंग टू
शंकर, रामानुज एण्ड माध्व भाष्याज’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के
रूप में इन्होंनें यह पाया कि आचार्य शंकर एवं रामानुज दोनों इस बात से सहमत है कि
ईश्वर हीं इस संसार का सृजनकर्त्ता और नाशकर्त्ता है। वहीँ प्रत्येक व्यक्ति को
अलग-अलग रूपों में उनके कर्मों के अनुसार फल देने वाला है। इसके साथ हीं साथ दोनों
ईश्वर के अवतार और पूजा आदि विषयों में भी सहमत है।
v कुमार, पी. राजेश (2000), के द्वारा ‘ईशावास्योपनिषद्: मतत्रयानुसारेण
विवर्शनात्मकमध्ययनम्’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में
इन्होंनें यह पाया कि सभी वेदान्तों का लक्ष्य स्थान एक हीं है, उसे हीं परम पद
आत्मतत्त्व के रूप में पुकारा जाता है। विभिन्न नामों से व्यवहृत यहीं तत्त्व
विभिन्न सम्प्रदाय के लोगों में अपनें तत्त्व अनुसन्धान के द्वारा प्राप्त किया
जाता है। यहीं दर्शन की भिन्नता है न कि दृश्य की।
v भट्ट, लक्ष्मी नारायण (2002), के द्वारा ‘उपनिषत्सु जीवन दर्शनम्’ विषय पर शोध कार्य
किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि उपनिषदों में अध्यात्म
विद्या के द्वारा श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि प्रयत्न मानव के जीवन एवं आयु के
सापेक्ष चिन्तन है। अतः संसरण शील आत्मा का संसार और बन्धन से मुक्ति का प्रयत्न
अनिवार्य है। शरीर से भिन्न शरीर आत्मा है जो पुनर्जन्म वृत्तान्त का बीज है।
v मलिक, इन्ताजहुसैन इमामखान (2003), के द्वारा ‘उपनिषद्स एण्ड इस्लामिक मिस्टिसिज्म अ स्टडी’
विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि
सम्पूर्ण वेदान्त साहित्य रहस्यात्मक तत्त्वों से भरा हुआ है। उपनिषद् भय रहित
मृत्यु के विषय में शिक्षा प्रदान करता है। सम्पूर्ण विश्व में ऐसा कोई अध्ययन
नहीं है जिसमें उपनिषदों का ज्ञान समाहित न हो। उपनिषद् एवं इस्लामिक साहित्य
दोनों में हीं काफी समानता है। क्योंकि ये दोनों हीं अन्तिम सत्य अथवा वास्तविक
रूप में केवल एक हीं परम तत्त्व की सार्वभौमिकता को स्वीकार करते हैं।
v वाराखेड़कर, के. वैद्यराजाचार्य (2003), के द्वारा ‘रिफ्लेक्शन ऑफ वेदाज एण्ड उपनिषद्स इन श्रीमद्
भागवत’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि
उपनिषदों का समावेश यत्र-तत्र क्रमशः स्कन्द पुराण एवं भागवत महापुराण में
समानार्थक श्लोक आदि वेदमंत्रो के रूप में हुआ है। ईशादि उपनिषद् वाक्यों का
समन्वय तो सम्यक् रूप से प्रदर्शित हुआ है। यहीं प्रबन्ध ग्रन्थ उपनिषद् की
विशेषता को वहन कर रहे हैं।
v सिंह, आभा (2006), के द्वारा ‘आचार्य शंकर कृत उपनिषद् भाष्यों का
समीक्षात्मक अध्ययन’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में
इन्होंनें यह पाया कि उपनिषदों में बहुविधि विषयों की विशेषता विद्यमान होनें से
उनका बहुविधि समीक्षात्मक अध्ययन सम्भव और सार्थक हो सकता है।
v पोख्रेल, शान्ति (2006), के द्वारा ‘छान्दोग्योपनिषत्तत्त्वसमीक्षा’ विषय पर शोध
कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि ऋषियों के
स्वप्रज्ञा चक्षु के द्वारा जिस ज्ञान का साक्षात्कार किया गया, उसे हीं वेद नाम
से जाना जाता है। किन्तु वर्तमान समय में ये वेद प्रायः लुप्त होते चले जा रहे हैं।
जिसका मुख्य कारण वेदाध्ययन का अभाव है। छान्दोग्योपनिषद् में वर्णित शिक्षा
व्यवस्था गुरु और शिष्य के भूमिका की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। ज्ञान
निश्चित रूप से ब्रह्म ज्ञान हीं है। क्योंकि ब्रह्मज्ञान में सभी प्रकार के ज्ञान
का अवसान हो जाता है। अशान्त संसार ब्रह्मज्ञान के द्वारा शान्ति और मुक्ति दोनों
प्राप्त कर सकता है।
v रघुवंशी, श्रध्दा सुभाषचन्द्र (2008), के द्वारा ‘बृहदारण्यक उपनिषद्: एक दार्शनिक अध्ययन’ विषय
पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि उपनिषदों
में सर्वाधिक प्राचीन तथा अत्यधिक महत्वपूर्ण बृहदारण्यक उपनिषद् है। जिसमें
आहार-व्यवहार तथा प्रतिपाद्य विषयों की दृष्टि से बृहद् वर्णन प्राप्त होता है।
v दूबे, महेन्द्र कुमार (2009), के द्वारा ‘उपनिषद् शिक्षा एवं टैगोर शिक्षा दर्शन का
वर्तमान भारतीय परिप्रेक्ष्य में एक तुलनात्मक अध्ययन’ विषय पर शोध कार्य किया गया।
शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि टैगोर में विश्ववादी भावना देखनें
को मिलती है। टैगोर पर उपनिषदों का प्रभाव है। अतएव उनमें विश्ववादी भावना स्वाभाविक
है। अतः टैगोर नें शिक्षा का अर्थ अत्यन्त व्यापक रूप में लिया है।
v मिश्रा, राधा (2009), के द्वारा ‘जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण: एक आलोचनात्मक
अध्ययन’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया
कि जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण, ब्राह्मण ग्रन्थ की अपेक्षा आरण्यक साहित्य के अधिक
निकट प्रतीत होता है। क्योंकि इसके प्रतिपाद्य विषयों में अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों
के समान यज्ञ सम्बन्धी विवेचना न होकर वेदी निर्माण, गायन, स्तोत्र, तान्त्रिक
प्रक्रियाओं आदि का वर्णन प्राप्त होता है।
v कुमारी, सुनीता (2012), के द्वारा ‘प्रमुख उपनिषदों में पुरुषार्थ चतुष्टय’ विषय
पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि पुरुषार्थ
चतुष्टय रूपी सुदृढ़ स्तम्भों पर मानव जीवन रूपी विशाल भवन खड़ा है। इसका उद्देश्य
मानव जीवन को सुखद, सुन्दर तथा सरल बनाना है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चार
पुरुषार्थ माने गये हैं। इन्हीं के आधार पर मनुष्य अपनें समस्त कार्य पूर्ण करता
है।
v शर्मिला, आर. (2013), के द्वारा ‘फेमिनिष्ट क्रिटिक ऑफ उपनिषद्स’ विषय पर शोध
कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि वास्तविक रूप में
उपनिषद् नारी जाति के उत्तराधिकार का दावा नहीं करता। यह प्रकरण पितृ सत्तात्मक
विचार के समक्ष एक अवसर है।
v बी., जयप्रकाश (2013), के द्वारा ‘कान्सेप्ट ऑफ माईंड इन द प्रिंसिपल उपनिषद्स’
विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि
प्राचीन भारतीय मनोवैज्ञानिकों के द्वारा तीन प्रकार के गुणों (सत्त्व, रज एवं तम)
की चर्चा की गई है इन्हीं तीन गुणों के परस्पर अन्तःक्रिया के परिणाम स्वरुप
विभिन्न गुणों से युक्त व्यक्तित्व का निर्माण होता है। भारतीय दर्शन मन अथवा
आत्मा के अध्ययन में गहन एवं महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
v सेन गुप्ता, संजीवन (2014), के द्वारा ‘उपनिषदिक इन्फ़्लुएन्स ऑन एजुकेशनल थाट्स ऑफ
रवीन्द्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानन्द एण्ड श्री अरविन्दों’ विषय पर शोध कार्य
किया गया। शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि रवीन्द्रनाथ टैगोर,
स्वामी विवेकानन्द एवं श्री अरविन्द इन तीनों शिक्षाशास्त्रियों नें अमूर्त्त
चिन्तन के परिप्रेक्ष्य में अपने प्रारम्भिक अवधारणाओं एवं अपनें अनुभवों का
नेतृत्व किया है। उपनिषद् कालीन शिक्षकों का मूल कर्त्तव्य यह था कि वे शिक्षार्थियों
का चरमोत्कर्ष विकास कर सके एवं वास्तविक सत्य की खोज में सहायता कर सके। इसके साथ
हीं साथ इन्होंनें यह भी स्पष्ट किया है कि प्रत्येक व्यक्ति वास्तविक रूप से ब्रह्मचर्य
एवं अभ्यास के द्वारा प्रशिक्षित होता है।
v दवे, कृष्णा पी. (2015), के द्वारा ‘चार्टिंग आउट ह्यूमन डेवलपमेंट बेस्ड ऑन
प्रिन्सिपल उपनिषद्स एण्ड इट्स एजूकेशनल इम्प्लीकेशंस’ विषय पर शोध कार्य किया गया।
शोध निष्कर्ष के रूप में इन्होंनें यह पाया कि उपनिषदों के सिध्दान्त चार वेदों पर
आधारित है। उपनिषद् मनुष्य के वास्तविक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ये मानव जीवन के विकास में विभिन्न प्रकार के दृष्टिकोणों का विकास करते हैं।
उपनिषदों की अद्वितीय विशेषताएँ एवं एकीकृत दृष्टिकोण जीवन की जटिलता को कम करती
है एवं सरल जीवन यापन को अर्थपूर्ण बनाती है।
v कोहन्डेल, हुसैन (2016), के द्वारा ‘कान्सेप्ट ऑफ अल्टीमेट रियलिटी इन मुल्ला सद्रा
एण्ड उपनिषद्स: अ कम्परेटिव स्टडी’ विषय पर शोध कार्य किया गया। शोध निष्कर्ष के
रूप में इन्होंनें यह पाया कि उपनिषद् और मुल्ला सद्रा के अनुसार सम्पूर्ण सृष्टि
एक वास्तविक यथार्थ पर निर्भर है। जिसे ब्रह्मा के अस्तित्व पर निर्भर बताया जाता
है। उपनिषदों में माया को सम्पूर्ण सृष्टि का कारण बताया गया है। जिसे आचार्य शंकर
नें भी स्वीकार किया है। किन्तु मुल्ला सद्रा के अनुसार सृष्टि का कारण प्रेम है।
अर्थात् प्रेम के द्वारा सृष्टि का निर्माण हुआ है, ऐसा इन्होंनें स्पष्ट किया है।
सन्दर्भ:
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v सिंह, आभा (2006), ‘आचार्य शंकर कृत उपनिषद् भाष्यों का
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शोध प्रबन्ध, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, उत्तर प्रदेश। पुनः
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पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 08, 2018. के द्वारा, URI: http://hdl.handle.net/10603/107485.
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मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़। पुनः प्राप्त किया गया, मार्च 08, 2018. के द्वारा,
URI: http://hdl.handle.net/10603/186118.
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