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Friday, 3 September 2021

 कल रात को मैंने साथी 

           कल रात को मैंने साथी

तुमको बहुत पुकारा था
होंठ बंद थे पलक खुली थी
जगते ख्वाबों में खूब निहारा था
कल रात को मैंने साथी
तुमको बहुत पुकारा था
तुम सुनते भी कैसे बात हमारी
दो दिलों में दूरी सुरक्षित थी
न तो मेरी हार सही थी
न तो तेरी जीत सही थी
हम भी जिद्दी तुम भी जिद्दी
ऐसे को कैसे मनायें फिर
नदी के दो किनारों को
दरिया आखिर मिलाये क्यों ?

                                                                                           *रंजय कुमार पटेल  

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