कल रात को मैंने साथी
कल रात को मैंने साथी
तुमको बहुत पुकारा थाहोंठ बंद थे पलक खुली थीजगते ख्वाबों में खूब निहारा थाकल रात को मैंने साथीतुमको बहुत पुकारा थातुम सुनते भी कैसे बात हमारीदो दिलों में दूरी सुरक्षित थीन तो मेरी हार सही थीन तो तेरी जीत सही थीहम भी जिद्दी तुम भी जिद्दीऐसे को कैसे मनायें फिरनदी के दो किनारों कोदरिया आखिर मिलाये क्यों ?
*रंजय कुमार पटेल
No comments:
Post a Comment