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Sunday, 5 September 2021

प्रेम का विस्तार और स्वार्थ का संकुचन

 

प्रेम का विस्तार और स्वार्थ का संकुचन’ शीर्षक पर निबन्ध

                                                                         *रंजय कुमार पटेल (शोधार्थी )

                                                                             (शैक्षिक अध्ययन विभाग)

                                                      महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, पूर्वी चम्पारण, बिहार

                                                                   Email: sagarranjay@gmail.com

रुपरेखा- 1. प्रस्तावना 2. शीर्षक की सार्वभौमकता 3. स्वार्थ का संकुचन से अभिप्राय 4. प्रेम का विस्तार से अभिप्राय 5. उपसंहार 6. सन्दर्भ

 

प्रस्तावना-

स्वामी विवेकानन्द (12 जनवरी, 1863-04 जुलाई, 1902) वेदान्त के प्रभावशाली और विख्यात आध्यात्मिक गुरु थे। विवेकानंद का  वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी कार्यरत है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत मेरे अमेरिकी भाइयों एवं बहनोंके साथ करने के लिये जाना जाता है। उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था।

शीर्षक की सार्वभौमकता-

“प्रेम विस्तार है, स्वार्थ संकुचन है इसलिए प्रेम जीवन का सिद्धांत है, वह जो प्रेम करता है जीता है, वह जो स्वार्थी है मर रहा है, इसलिए प्रेम के लिए प्रेम करो, क्योंकि जीने का यही एक मात्र सिद्धांत है, वैसे ही जैसे कि तुम जीने के लिए सांस लेते हो..!”

                                                                               स्वामी विवेकानंद

All love is expansion, all selfishness is contraction. Love is therefore the only law of life. He who loves lives, he who is selfish is dying. Therefore love for love’s sake, because it is the only law of life, just as you breathe to live.

                                                                                                                Swami Vivekananda

प्रेम विस्तार है, स्वार्थ सकुंचन हैयह उद्गार भारत के महान दार्शनिक एवं संत स्वामी विवेकानंद द्वारा व्यक्त किया गया है। स्वामी जी द्वारा कही गई यह पंक्ति एकदम सटीक और हर युग के  समयानुकूल है। स्वामी विवेकानंद जी ने शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन को संबोधित करते हुए उक्त कथन को अभिव्यक्त किया था। असल में हम लोगों से प्रेम वास्तव में तभी कर पाएंगे जब हमारी सोच ऐसी होगी। यदि हम अपने मन में दूसरों की बुराइयों को भरे रहेंगे तो हम उनसे प्रेम नहीं कर पाएंगे। गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है- प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना। जब सभी में ईश्वर का निवास है, तो मैं कौन होता हूँ किसी से नफरत करने वाला। यह विश्वास रखिए कि यदि कोई बुरा करता है तो उसको देखना वाला ईश्वर है। आपका धर्म है सबसे प्रेम करना। लेकिन इसके लिए आस्था बहुत जरूरी है। आपके मन में आस्था नहीं है,आप ईश्वरीय सत्ता को नहीं मानते हैं, या ढुलमुल आस्तिक हैं, तो आप सब कुछ अपने आप ही सुधारना चाहेंगे। तब आप शायद सबको प्रेम नहीं कर पाएंगे। एक पंक्ति देवानंद जी पर फिल्माए गए भारतीय फ़िल्मी गाने की भी याद आ रही है-

नफरत करने वालों के सीने में प्यार भर दूँ,

मैं वो परवाना हूँ, पत्थर को मोम कर दूँ ।

स्वार्थ का संकुचन से अभिप्राय-

स्वार्थ का दायरा बहुत ही छोटा है । स्वार्थ की भावना मनुष्य को मतलबी बनाता है । स्वार्थ मानव को गलत रास्ते और सबसे दूर ले जाता है । मनुष्य का स्वार्थी मन किसी की खुशी नहीं देख सकता।  स्वार्थ के रास्ते चलने पर हमें कुछ हासिल नहीं होता । दूसरी तरफ स्वार्थी रहकर हम स्वयं को अपने अंदर ही समेट लेते हैं क्योंकि हम अपनी दुनिया में सिमट जाते हैं। स्वार्थ हमें केवल स्वयं के बारे में ही सोचने को विवश कर देता है, जिसके कारण हमें आसपास अपने हित के अलावा और कुछ नजर नहीं आता और हमारी दुनिया छोटी होती जाती है, सकुंचित हो जाती है इस प्रकार स्वार्थ हमें सकुंचन की ओर ले जाता है। स्वार्थी बनने की प्रवृत्ति नकारात्मकता का प्रतीक है। नकारात्मकता जीवंतता नही बल्कि मृत्यु का प्रतीक है। इस पृथ्वी पर अगर सब लोग स्वार्थी होते तो आज वैसा संसार ही नही होता जैसा आज है। शायद संसार का अस्तित्व ही समाप्त हो गया होता। संसार में अनेक लोग ऐसे हुये हैं जो अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर परमार्थ के कार्य में लगे, तभी तो ये सुंदर संसार बन पाया। 

प्रेम का विस्तार से अभिप्राय-

प्रेम की हम परिभाषा जानने का प्रयत्न करें तो हमें समझना पड़ेगा कि प्रेम क्या है? प्रेम एक अहसास है जो केवल व्यक्त और अनुभव ही किया जा सकता है। प्रेम सकारात्मकता का प्रतीक है। प्रेम को अपनाकर हम अपने जीवन में अपने विचारों को सकारात्मक बनाते हैं। जब हमारे विचार सकारात्मक बनते हैं तो हमारे आसपास का वातावरण भी सकारात्मक बनता है। हमारे चरित्र और आचरण में विविधता आती है। हमारा सामना और संपर्क भी सकारात्मक प्रवृत्ति के लोगों से होता है, या हम अपने संपर्क में आने वाले व्यक्ति को सकारात्मक बना देते हैं। यहीं से हमारा विस्तार प्रारंभ होता है। प्रेम एक ऐसा गुण है जिसको अपनाने पर वो हमारे अंदर एक दिव्य आभा उत्पन्न कर देता है। एक ऐसी आभा जो सबको आकर्षित करती है। प्रेम जीवंतता का प्रतीक है। क्योंकि जिसने प्रेम करना और प्रेम बांटना सीख लिया वो ही जीवित है, वो जीवन का सच्चे अर्थों में आनंद ले सकता है। जहाँ प्रेम है, वहाँ दया, करुणा, ममता जैसे संवेदी गुण अवश्य होंगे। जो इन सद्गुणों से युक्त वो ही उत्तम मानव है। प्रेम से हम सब का दिल जीत सकते है और सब कुछ हासिल कर सकते है । प्रेम आपस में मिलकर रहना सीखाता है ।

मैंने  व्यवहारिक जीवन में यह देखा कि प्रेम  वह भाषा है जिसे बहरे सुन सकते हैं और अंधे देख सकते हैं । प्रेम करने ने  के  लिए किसी कारण की आवश्यकता  नहीं होती। प्रेम अपनी गहराई स्वयं  जानता है। तुम प्रेम की गहराई  को  तब  समझ सकोगे जब  बिछड़ने का वक़्त आ जाये। मेरी बातों पर  संदेह नहीं करो क्योंकि  प्रेम और संदेह में कभी बातचीत नहीं होती  है। यह सत्य है कि  प्रेम के बिना जीवन उस वृक्ष के समान है जिसपे न कभी  बहार आती है और  न फल लगते हैं। यदि आपके अंतःकरण में  प्रेम का स्थान नहीं है अथवा आपको प्रेम कि अनुभूति नहीं हुई है तो ये मत कहो कि, “मैंने सच खोज लिया है। दृढ विश्वास की पुनरावृत्ति प्रेम से पैदा होती  है। और एक बार जब वो विश्वास गहरी आस्था में बदल जाता है तो अप्राप्त सफलता  भी प्राप्त हो जाती है।

उपसंहार-

प्रेम से पूरी दुनिया आपकी हो सकती है लेकिन स्वार्थपरता के चलते आपकी दुनिया बिल्कुल संकुचित भी हो जाती है। स्वार्थी व्यक्ति से लोग दूर भागने लगते हैं इसलिए प्रेम को विस्तार और स्वार्थ को संकुचन कहा गया है। याद रखिये हम केवल उन्हीं लोगों को याद रखते हैं जिन्होंने समाज के लिये कुछ किया, समाज में प्रेम बांटा। जो केवल स्वार्थी बने रहे उनका नाम कौन जानता है? अतः जो प्रेम से भरा है वही जी रहा है, जो स्वार्थी है वो निरंतर मृत्यु की ओर बढ़ रहा है। इसलिये अपने स्वार्थ का परित्याग करके जीवन में प्रेम को अपनाओ। सब से प्रेम करो। इस प्रकृति से प्रेम करो, प्राणियों से प्रेम करो। इस संसार से प्रेम करो। आपका विस्तार निरंतर होता जायेगा। आप स्वार्थी बनोगे तो आप संकुचित होते जाओगे और एक दिन असमय काल के ग्रास बन जाओगे। इसलिये प्रेम विस्तार है, और स्वार्थ संकुचन है।

इस प्रकार वेदों के ज्ञाता और महान दार्शनिक स्‍वामी विवेकानंद ने न सिर्फ भारत के उत्‍थान के लिए काम किया बल्‍कि लोगों को जीवन जीने की कला भी सिखाई। परोपकार, भाई-चारा, प्रेम, आत्‍म-सम्‍मान, शिक्षा और महिला मुक्ति के लिए उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं और आने वाले समय में भी लोगों को रास्‍ता दिखाते रहेंगे।

सन्दर्भ-

1.     https://brainly.in/question/11986256

2.     https://brainly.in/question/11921883

3.     http://charlaina.com/685/quotes/all-love-is-expansion-all-selfishness-is-contraction/

4.     http://www.samaysakshi.in/2018/05/17/206

5.     https://gyanapp.in/hindi/questions/

6.     https://khabar.ndtv.com/news/lifestyle/swami-vivekanand-quotes-in-hindi-1798865

 

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