जनकवि के रूप में नागार्जुन की कविताओं का अध्ययन
1.0 प्रस्तावना-
नागार्जुन प्रगतिशील काव्यधारा के ‘जनकवि’
हैं। वे इस काव्यधारा के प्रमुख स्तम्भों में से एक हैं। कविवर नागार्जुन के जीवन
संघर्षों की अपनी एक कहानी है। यहीं कारण है, कि उन्होंने पीड़ित व शोषित समाज की
अनुभूति का वर्णन अपनी कविताओं में बखूबी से किया है। रुसी आलोचक युंग ने
कहा है “सच्ची कविता वही है, जो जनता के साथ रिश्ता व्यक्त करती है।” आधुनिक
हिंदी कविता को लोकप्रिय एवं संवेदी बनाने में जिन कवियों का महत्वपूर्ण स्थान है
उनमें नागार्जुन का प्रथम पंक्ति में नाम आता है। उन्होंने सदैव ज्ञान विज्ञान एवं
नई शिक्षा का हृदय से स्वागत किया। वे अपने स्वर को खेत, किसान, मजदूर तक ले जाने
के आकांक्षी हैं। उनकी कविता ने जीवन के अमृत एवं हलाहल दोनों का रसपान किया है। नागार्जुन
अपने बारे में कहते हैं- कवि हूं पीछे, पहले मै मानव ही
हूं। नागार्जुन के प्रशंसक पहले उनको कवि मानते हैं बाद
में मानव। उन्होंने जैसा वर्णन दीन-हिन, निर्धन और असहाय
लोगों का किया है, वैसा वर्णन कहीं और नहीं मिलता। वे लिखते
हैं –
“कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त
दानें आये घर के अन्दर, कई दिनों के बाद
धुआं उड़ा आंगन के ऊपर कई दिनों के बाद”
नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य परंपरा हीं
जीवंत रूप में उपस्थित देखी जा सकती है। उनका कवि व्यक्तित्व कालिदास और विद्यापति
जैसे कई कालजयी कवियों के रचना संसार के गहन अवगाहन, बौध्द एवं मार्क्सवाद जैसे बहुजनोन्मुख
दर्शन के व्यावहारिक अनुगमन तथा सबमें अपने समय तथा परिवेश की समस्याओं, चिंताओं
एवं संघर्षों से प्रत्यक्ष जुड़ाव तथा लोक संस्कृति एवं लोक हृदय की गहरी पहचान से
निर्मित है।
नागार्जुन-
नागार्जुन (३० जून १९११-५ नवंबर १९९८) हिन्दी और मैथिली के
अप्रतिम लेखक और कवि थे।
उनका असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था
परंतु हिन्दी साहित्य में उन्होंने नागार्जुन तथा मैथिली में यात्री उपनाम से
रचनाएँ कीं। इनके पिता श्री गोकुल मिश्र तरउनी गांव के एक किसान थे और खेती के
अलावा पुरोहिती आदि के सिलसिले में आस-पास के इलाकों में आया-जाया
करते थे। उनके साथ-साथ
नागार्जुन भी बचपन से ही “यात्री” हो गए। आरंभिक
शिक्षा प्राचीन पद्धति से संस्कृत में हुई किन्तु आगे स्वाध्याय पद्धति से ही
शिक्षा बढ़ी। राहुल सांकृत्यायन के “संयुक्त
निकाय” का अनुवाद पढ़कर वैद्यनाथ की इच्छा हुई कि यह ग्रंथ
मूल पालि में पढ़ा जाए। इसके लिए वे लंका चले गए जहाँ वे स्वयं पालि पढ़ते थे और
मठ के “भिक्खुओं” को संस्कृत पढ़ाते
थे। यहाँ उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली।
नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी
भारतीय काव्य-परंपरा ही जीवंत रूप में उपस्थित देखी जा सकती है। उनका
कवि-व्यक्तित्व कालिदास और विद्यापति जैसे कई कालजयी कवियों के रचना-संसार के गहन
अवगाहन, बौद्ध एवं मार्क्सवाद जैसे बहुजनोन्मुख
दर्शन के व्यावहारिक अनुगमन तथा सबसे बढ़कर अपने समय और परिवेश की समस्याओं, चिन्ताओं एवं संघर्षों से प्रत्यक्ष
जुड़ा़व तथा लोकसंस्कृति एवं लोकहृदय की गहरी पहचान से निर्मित है। उनका ‘यात्रीपन’ भारतीय मानस एवं विषय-वस्तु को समग्र और सच्चे रूप में समझने का
साधन रहा है। मैथिली, हिन्दी और संस्कृत के अलावा पालि, प्राकृत, बांग्ला, सिंहली, तिब्बती आदि अनेकानेक भाषाओं का ज्ञान भी
उनके लिए इसी उद्देश्य में सहायक रहा है। उनका गतिशील, सक्रिय और प्रतिबद्ध सुदीर्घ जीवन उनके काव्य में जीवंत रूप से
प्रतिध्वनित-प्रतिबिंबित है। नागार्जुन सही अर्थों में भारतीय मिट्टी से बने
आधुनिकतम कवि हैं। उन्होंने आज़ादी के पहले और बाद में भी कई
बड़े जनांदोलनों में भाग लिया था। 1939 से 1942 के बीच बिहार में किसानो के एक प्रदर्शन
का नेतृत्व करने की वजह से जेल में रहे। आज़ादी के बाद लम्बे समय तक वो पत्रकारिता
से भी जुड़े रहे। जन संघर्ष में अडिग आस्था, जनता से गहरा लगाव और एक न्यायपूर्ण समाज
का सपना, ये तीन गुण नागार्जुन के व्यक्तित्व में
ही नहीं, उनके साहित्य में भी घुले-मिले हैं।
“पेशा से
प्राइमिरी स्कूल का मास्टर था
तनखा भी तीस
रूपये सो भी नहीं मिली
मुस्किल
से कांटे हैं
एक नहीं दो
नहीं नौ नौ महीने।”
निराला के बाद नागार्जुन अकेले ऐसे कवि हैं, जिन्होंने इतने छंद, इतने
ढंग, इतनी शैलियाँ और इतने काव्य रूपों का इस्तेमाल
किया है। पारंपरिक काव्य रूपों को नए कथ्य के साथ इस्तेमाल करने और नए काव्य
कौशलों को संभव करनेवाले वे अद्वितीय कवि हैं। उनके कुछ काव्य शिल्पों में
ताक-झाँक करना हमारे लिए मूल्यवान हो सकता है। उनकी अभिव्यक्ति का ढंग तिर्यक भी
है, बेहद ठेठ और सीधा भी। अपनी तिर्यकता में
वे जितने बेजोड़ हैं, अपनी वाग्मिता में वे उतने ही विलक्षण हैं।
काव्य रूपों को इस्तेमाल करने में उनमें किसी प्रकार की कोई अंतर्बाधा नहीं है।
उनकी कविता में एक प्रमुख शैली स्वगत में मुक्त बातचीत की शैली है। नागार्जुन की
ही कविता से पद उधार लें तो कह सकते हैं-स्वागत शोक में बीज निहित हैं विश्व व्यथा
के। भाषा पर बाबा का गज़ब अधिकार है। देसी
बोली के ठेठ शब्दों से लेकर संस्कृतनिष्ठ शास्त्रीय पदावली तक उनकी भाषा के अनेकों
स्तर हैं। उन्होंने तो हिन्दी के अलावा मैथिली, बांग्ला और संस्कृत में अलग से बहुत लिखा है। जैसा पहले भाव-बोध
के संदर्भ में कहा गया, वैसे ही भाषा की दृष्टि से भी
यह कहा जा सकता है कि बाबा की कविताओं में कबीर से लेकर धूमिल तक की पूरी हिन्दी
काव्य-परंपरा एक साथ जीवंत है। बाबा ने छंद से भी परहेज नहीं किया, बल्कि उसका अपनी कविताओं में क्रांतिकारी
ढंग से इस्तेमाल करके दिखा दिया। बाबा की कविताओं की लोकप्रियता का एक आधार उनके
द्वारा किया गया छंदों का सधा हुआ चमत्कारिक प्रयोग भी है।
प्रकाशित
कृतियाँ-
कविता-संग्रह - अपने खेत
में, युगधारा, सतरंगे
पंखों वाली, तालाब की मछलियां, खिचड़ी विप्लव देखा हमने, हजार-हजार
बाहों वाली, पुरानी जूतियों का कोरस, तुमने कहा
था, आखिर ऐसा
क्या कह दिया मैंने, इस गुबार की छाया में, ओम मंत्र, भूल जाओ पुराने सपने, रत्नगर्भ।
उपन्यास- रतिनाथ की चाची, बलचनमा, बाबा बटेसरनाथ, नयी पौध, वरुण के
बेटे, दुखमोचन, उग्रतारा, कुंभीपाक, पारो, आसमान में
चाँद तारे।
व्यंग्य- अभिनंदन
निबंध
संग्रह- अन्न हीनम क्रियानाम
बाल
साहित्य - कथा मंजरी भाग-१, कथा मंजरी भाग-२, मर्यादा पुरुषोत्तम, विद्यापति की कहानियाँ
मैथिली
रचनाएँ- चित्रा , पत्रहीन नग्न गाछ (कविता-संग्रह), पारो, नवतुरिया
(उपन्यास)।
बांग्ला
रचनाएँ- मैं
मिलिट्री का पुराना घोड़ा (हिन्दी अनुवाद)
ऐसा क्या कह
दिया मैंने- नागार्जुन रचना संचयन
पुरस्कार-
नागार्जुन को 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से उनके ऐतिहासिक मैथिली रचना पत्रहीन नग्न गाछ के लिए नवाजा गया था। उन्हें साहित्य
अकादमी ने १९९४ में साहित्य अकादमी फेलो के रूप में नामांकित कर सम्मानित भी किया
था।
कविता
(काव्य)
काव्य, कविता या पद्य, साहित्य की वह विधा
है जिसमें किसी कहानी या मनोभाव को कलात्मक
रूप से किसी भाषा के द्वारा
अभिव्यक्त किया जाता है। भारत में कविता
का इतिहास और कविता का दर्शन बहुत पुराना है। इसका प्रारंभ भरतमुनि से समझा जा
सकता है। कविता का शाब्दिक अर्थ है काव्यात्मक रचना या कवि की कृति, जो छन्दों की
शृंखलाओं में विधिवत बांधी जाती है। काव्य वह वाक्य रचना है जिससे चित्त किसी रस
या मनोवेग से पूर्ण हो। अर्थात् वहजिसमें चुने हुए शब्दों के द्वारा कल्पना और
मनोवेगों का प्रभाव डाला जाता है। रसगंगाधर में 'रमणीय' अर्थ के
प्रतिपादक शब्द को 'काव्य' कहा है। 'अर्थ की रमणीयता' के अंतर्गत शब्द की रमणीयता (शब्दलंकार) भी समझकर लोग इस
लक्षण को स्वीकार करते हैं। पर 'अर्थ' की 'रमणीयता' कई प्रकार की हो सकती है। इससे यह लक्षण बहुत स्पष्ट नहीं
है। साहित्य दर्पणाकार विश्वनाथ का
लक्षण ही सबसे ठीक जँचता है। उसके अनुसार 'रसात्मक वाक्य ही काव्य
है'। रस
अर्थात् मनोवेगों का सुखद संचार की काव्य की आत्मा है। काव्यप्रकाश में
काव्य तीन प्रकार के कहे गए हैं, ध्वनि, गुणीभूत व्यंग्य और चित्र। ध्वनि वह है जिस, में शब्दों
से निकले हुए अर्थ (वाच्य) की अपेक्षा छिपा हुआ अभिप्राय (व्यंग्य) प्रधान हो।
गुणीभूत ब्यंग्य वह है जिसमें गौण हो। चित्र या अलंकार वह है जिसमें बिना ब्यंग्य
के चमत्कार हो। इन तीनों को क्रमशः उत्तम, मध्यम और
अधम भी कहते हैं। काव्यप्रकाशकार का जोर छिपे हुए भाव पर अधिक जान पड़ता है, रस के
उद्रेक पर नहीं। काव्य के दो और भेद किए गए हैं, महाकाव्य और खंड काव्य। महाकाव्य सर्गबद्ध और उसका नायक कोई देवता, राजा या
धीरोदात्त गुंण संपन्न क्षत्रिय होना चाहिए।
उसमें शृंगार, वीर या शांत रसों में से कोई रस प्रधान होना चाहिए। बीच बीच में करुणा; हास्य
इत्यादि और रस तथा और और लोगों के प्रसंग भी आने चाहिए। कम से कम आठ सर्ग होने
चाहिए। महाकाव्य में संध्या, सूर्य, चंद्र, रात्रि, प्रभात, मृगया, पर्वत, वन, ऋतु, सागर, संयोग, विप्रलम्भ, मुनि, पुर, यज्ञ, रणप्रयाण, विवाह आदि का यथास्थान सन्निवेश होना चाहिए। काव्य दो
प्रकार का माना गया है, दृश्य और श्रव्य। दृश्य काव्य वह है जो अभिनय द्वारा
दिखलाया जाय, जैसे, नाटक, प्रहसन, आदि जो
पढ़ने और सुनेन योग्य हो, वह श्रव्य है। श्रव्य काव्य दो प्रकार का होता है, गद्य और
पद्य। पद्य काव्य के महाकाव्य और खंडकाव्य दो भेद कहे जा चुके हैं। गद्य काव्य के
भी दो भेद किए गए हैं- कथा और आख्यायिका। चंपू, विरुद और
कारंभक तीन प्रकार के काव्य और माने गए है।
कविता
(काव्य) की परिभाषा -
कविता
या काव्य क्या है इस विषय में भारतीय साहित्य में
आलोचकों की बड़ी समृद्ध परंपरा है—आचार्य विश्वनाथ, पंडितराज जगन्नाथ, पंडित
अंबिकादत्त व्यास, आचार्य श्रीपति, भामह आदि
संस्कृत के विद्वानों से लेकर आधुनिक आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा जयशंकर प्रसाद जैसे
प्रबुद्ध कवियों और आधुनिक युग की मीरा महादेवी वर्मा ने
कविता का स्वरूप स्पष्ट करते हुए अपने अपने मत व्यक्त किए हैं। विद्वानों का विचार
है कि मानव हृदय अनन्त रूपतामक जगत के नाना रूपों, व्यापारों
में भटकता रहता है, लेकिन जब मानव अहं की भावना का परित्याग
करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो
जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई
है उसे कविता कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर
उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक सम्बंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की
अनेक परिभाषाएँ दी गई हैं।
“वाक्यं
रसात्मकं काव्यम्।” – आचार्य विश्वनाथ
“तद्
दोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृति पुनः क्वापि।”
- आचार्य मम्मट
“कविता हमारे
परिपूर्ण क्षणों की वाणी है।” – पन्त
ये परिभाषाएं आधुनिक
हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक
आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं
शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस
काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।
काव्य
के प्रयोजन -
“काव्यं यशसे अर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे॥“
(मम्मट)
इसके साथ
हीं साथ तुलसीदास ने भी लिखा है कि-
“स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा।”
2.0 संबंधित साहित्य की समीक्षा –
प्रस्तावित शोध अध्ययन हेतु निम्नलिखित शोध साहित्यों की
समीक्षा की गई है –
2.1 रजक (2014) के
द्वारा ‘कविता और सौन्दर्य का रिश्ता’ विषय पर शोध कार्य किया गया।
इन्होनें अपने शोध के निष्कर्ष में यह पाया कि जब किसी वस्तु, दृश्य या भाव से
मनुष्य एकाकार हो जाता है तब सौन्दर्य बोध होता है। इन्होनें आचार्य रामचन्द्र
शुक्ल के कथन का समर्थन किया है, और उन्हीं के शब्दों में यह स्पष्ट किया है कि
‘कवि की दृष्टि तो सौन्दर्य की ओर जाती है चाहे वह जहाँ हो वस्तुओं के रूप रंग में
अथवा मनुष्यों के मन, वचन अथवा कर्म में।’
2.2 सिंह (2013) के
द्वारा ‘कविता एवं आम आदमी से संवादी संबंध स्थापित करता कवि धूमिल’ विषय
पर शोध कार्य किया गया। इन्होनें अपने शोध के निष्कर्ष में यह पाया कि अंधकार
धूमिल में नहीं बल्कि उस समाज में व्याप्त था जिसमे धूमिल नें अपना जीवन जिया था
और जिस समाज में अन्धकार व्याप्त हो उस समाज को रोशनी देने का कार्य सदियों से
साहित्यकार हीं करते आये हैं। धूमिल की कविता का स्वर संवेदनात्मक है जिसमे
वक्तव्यों, कथनों तथा सूक्तियों का प्रयोग हुआ है। धूमिल की भाषा का मुख्य चरित्र
कुल मिलकर व्यंग्यात्मक हीं है।
2.3 नीतू (2015) के
द्वारा ‘नागार्जुन के काव्य में विद्रोही चेतना: एक मूल्यांकन’ विषय पर शोध
कार्य किया गया। इन्होनें अपने शोध के निष्कर्ष में यह पाया कि नागार्जुन होने का
अर्थ है मानवीय जीवन के समूचेपन पर निगाह रखना और उनके अधूरेपन को रचनात्मक संघर्ष
द्वारा पूर्णता देना। जग जीवन के ऐसे सजग चितेरे आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी
विरासत हमारे पास है। जब तक यह मानव समाज रहेगा नागार्जुन के विचार उनमें समता,
सद्भाव, आक्रोश, अधिकारों की मांग एवं उसकी पक्षधर्ता का बीजारोपण करते रहेंगें।
यहीं एक सफल साहित्यकार की अक्षुण्य पूंजी मणि जाएगी।
3.0 शोध का औचित्य –
पूर्व में किये गये सभी शोधों तथा इनके चरों के मध्य संबंधों से यह पता चलता है कि किसी भी
अनुसंधानकर्त्ता के द्वारा ‘जनकवि के रूप में नागार्जुन की
कविताओं का अध्ययन’ विषय पर किसी भी प्रकार का शोध
कार्य नहीं किया गया है। इस क्षेत्र में ज्ञान की रिक्तता अभी भी जस की तस बनी हुई
है। जिसे कि शोधार्थी द्वारा शोध समस्या के रूप में प्रस्तावित किया गया है। अतः
प्रस्तावित शोध समस्या पर यदि अनुसन्धान कार्य किया जाता है, तो निश्चित रूप से यह
यत्किंचित रूप में समाज तथा शैक्षिक जगत के लिए अपने स्तर पर योगदान कर सकेगा।
जिससे कि इस क्षेत्र के ज्ञानपिपासु निःसन्देह लाभान्वित हो सकेंगें।
4.0 शोध का उद्देश्य-
1. नागार्जुन की कविताओं का विस्तृत
अध्ययन करना।
2.
नागार्जुन के साहित्यिक जीवन का
अध्ययन करना।
3.
नागार्जुन की कविता को आम जनमानस तक
पहुँचाना।
4.
हिंदी साहित्य में नागार्जुन के
योगदान को रेखांकित करना।
5.
जनकवि के रूप में उनके महत्व को रेखांकित करना।
6. तत्कालीन समाज की शैक्षिक गतिविधि एवं देश की स्थिति तथा पराधीनता के कारणों का अध्ययन करना।
5.0 समस्या कथन –
जनकवि
के रूप में नागार्जुन की कविताओं का अध्ययन।
6.0 शोध का महत्व -
विशिष्ट विद्वानों का यह
तर्क है कि किया गया कार्य कभी भी शून्य नहीं होता। किन्तु फिर भी यदि शून्य
मान भी लिया जाये तो कम से कम अनुसन्धान सम्बन्धी कार्य तो बिल्कुल भी शून्य नहीं
होता। निश्चित रूप से उसके पीछे एक दर्शन छिपा हुआ होता है। अतः आवश्यकता होती है,
उस दर्शन को पहचानने की। निश्चित रूप से
प्रस्तावित शोध शिक्षकों एवं शिक्षार्थियों के मध्य पारस्परिक अन्तःक्रिया को
बढ़ावा देगा तथा शिक्षण अधिगम के वातावरण को एक नया आधार प्रदान कर सकेगा। इसके साथ हीं साथ काव्य
जगत के कविता निर्माणकर्त्ताओं को भी यदि थोड़ी बहुत सहायता प्राप्त होती है, तो यह
अनुसंधानकर्त्ता का परम सौभाग्य होगा। अतः प्रस्तावित शोध के
विषय क्षेत्र, नवीनता, मौलिकता तथा व्यापकता को ध्यान में रखते हुए इसके महत्त्व
का अन्दाजा विद्वतजन समूह (सरस्वती पुत्रों) के द्वारा स्वतः रूप में हीं लगाया जा
सकता है।
7.0 शोध प्रविधि –
प्रस्तावित शोध कार्य गुणात्मक शोध विधि
पर आधारित है, जो कि शोध की प्रकृति के अनुरूप भी है। अतः शोध में बहु प्रयुक्त
अन्तःवस्तु विश्लेषण प्रविधि का प्रयोग किया जाएगा।
8.0 निष्कर्ष-
अच्छी कविता सम्पूर्ण जीवन मांगती है। जीवन
से विमुख कवितायें अर्थहीन हो जाती है। नागार्जुन की कवितायें जीवनोन्मुखी स्वतः
सिद्ध होती हैं। अनुभूति एवं अभिव्यक्ति का सन्तुलन कवि की कविता का गुण है।
नागार्जुन की कविताओं में सभी तत्त्वों का अद्भुत सामंजस्य है। उनकी कविताओं में
निहित सहजता एवं अन्तःदृढ़ता पाठक अथवा श्रोता को सर्वाधिक प्रभावित करती है। इस
प्रकार शोधकर्ता द्वारा अपने शोध के दौरान अनछुए पहलुओं को रेखांकित करते हुए उसके
अदृश्य शक्तियों को उद्घाटित करने का सफल व सार्थक प्रयास किया जायेगा।
9.0 शोध
का परिसीमन –
1.
इस अध्ययन का क्षेत्र केवल
भारतीय भाषा (हिन्दी) होगी।
2.
यह अध्ययन केवल भारतीय परिवेश
में किया जाएगा।
3. यह अध्ययन केवल नागार्जुन की कविताओं के आधार पर किया जाएगा।
10.0 संभावित अध्यायीकरण –
|
प्रथम अध्याय |
प्रस्तावना |
|
समस्या कथन |
|
|
संक्रियात्मक परिभाषा |
|
|
शोध का महत्त्व |
|
|
शोध का औचित्य |
|
|
शोध उद्देश्य |
|
|
परिसीमन |
|
|
द्वितीय अध्याय |
सम्बन्धित साहित्य की समीक्षा |
|
तृतीय अध्याय |
योजना एवं क्रिया विधि |
|
शोध प्रविधि |
|
|
प्रदत्तों का संकलन |
|
|
चतुर्थ अध्याय |
विश्लेषण एवं व्याख्या |
|
पंचम अध्याय |
निष्कर्ष एवं सुझाव |
|
शोध निष्कर्ष |
|
|
शैक्षिक निहितार्थ |
|
|
भावी शोध हेतु सुझाव |
|
|
परिशिष्ट |
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची |
11.0 समय प्रबंधन -
प्रस्तावित शोध अध्ययन कुल 8 माह में अनुसन्धानकर्त्ता द्वारा पूर्ण कर लिया
जाएगा। जिसका उचित रूप में समय प्रबन्धन निम्नलिखित रूप में किया जा रहा है –
|
अध्याय |
कार्य |
अपेक्षित समय |
|
प्रथम |
प्रस्तावना संबंधी कार्य |
6 माह |
|
द्वितीय |
संबंधित साहित्य की समीक्षा |
6 माह |
|
तृतीय |
योजना एवं क्रिया विधि |
12 माह |
|
चतुर्थ |
प्रदत्तों का संकलन एवं निर्वचन |
6 माह |
|
पंचम |
निष्कर्ष एवं सुझाव |
6 माह |
सन्दर्भ
ग्रन्थ सूची –
1.
रजक, ए. पी. (2014), कविता और
सौन्दर्य का रिश्ता, अपनी माटी, वर्ष 2, अंक जुलाई-सितम्बर, 2014. चित्तौडगढ़,
राजस्थान, ISSN: 23220724.
पुनः प्राप्त
किया गया, जून 24, 2018. के द्वारा http://www.apnimaati.com/2014/08/blog-post_65.html
2.
सिंह,
पी. (2013), कविता एवं आम आदमी से सम्बन्ध स्थापित करता कवि धूमिल, अपनी
माटी, वर्ष 1, अंक 1, 2013. चित्तौडगढ़, राजस्थान, ISSN:
23220724.
पुनः प्राप्त
किया गया, जून 24, 2018. के द्वारा http://www.apnimaati.com/2013/12/blog-post_3512.html
3.
सिंह,
एन. (2014), नागार्जुन के काव्य में विद्रोही चेतना: एक मूल्यांकन,
अप्रकाशित शोध प्रबन्ध. वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर, उत्तर
प्रदेश.
पुनः प्राप्त
किया गया, जून 24, 2018. के द्वारा http://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/50173
- "लोक-सरोकारों
के कवि नागार्जुन". सृजनशिल्पी. अभिगमन तिथि: २००८.
- "बाबा नागार्जुन (यात्री जी)- कालजयी रचनाकार, विद्रोही कवि". द दरभंगा एक्सप्रेस. अभिगमन तिथि: २०१८.
- "नागार्जुन
रचना संचयन" (पीएचपी). भारतीय साहित्य संग्रह. अभिगमन तिथि: २००८.
- "नागार्जुन के काव्य की भाव-भूमि और भाषा" (एचटीएमएल). हिन्दी कैफ़े. अभिगमन तिथि: २००८.
No comments:
Post a Comment